झारखंड और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में होटल और रिसॉर्ट पॉलिटिक्स की सुगबुगाहट तेज हो गई है. कांग्रेस को क्रॉस वोटिंग और विधायकों की खरीद-फरोख्त यानी हॉर्स ट्रेडिंग का डर सता रहा है. यही वजह है कि जो चुनाव कभी बेहद शांत माना जाता था, वह अब रोज नई और सनसनीखेज सुर्खियां बटोर रहा है.
इस चुनाव की प्रक्रिया को समझना बहुत जरूरी है. इसमें विधायक अपना वोट डालने से पहले अपने मतपत्र को अपनी पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाते हैं, ताकि कोई अपनी पार्टी से गद्दारी न कर सके. इसे ही क्रॉस वोटिंग और हॉर्स ट्रेडिंग रोकने का जरिया माना जाता है. इसके बावजूद कई बार विधायक अपनी पार्टी के बजाय दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को वोट दे देते हैं.
इतिहास गवाह है कि राज्यसभा चुनाव में बहुत मामूली अंतर से भी बड़े-बड़े नतीजे पलट जाते हैं, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल अपने एक भी विधायक के बहकने को हल्के में नहीं लेता.
झारखंड : तीन उम्मीदवार, दो सीटें और हॉर्स ट्रेडिंग का सबसे बड़ा अखाड़ा
झारखंड इस पूरे चुनाव का सबसे बड़ा और सबसे चर्चित केंद्र बन गया है. यहां की दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में आ चुके हैं, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है. झामुमो (JMM) की तरफ से बैद्यनाथ राम और कांग्रेस की तरफ से प्रणव झा मैदान में हैं. जबकि भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर परिमल नाथवानी ने एंट्री मार दी है.
नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज के कॉर्पोरेट अफेयर्स निदेशक और मुकेश अंबानी के बेहद करीबी सहयोगी माने जाते हैं. भाजपा ने अपना कोई उम्मीदवार न उतारकर सीधे नाथवानी को समर्थन दे दिया है. नाथवानी ने रांची पहुंचते ही भाजपा मुख्यालय का दौरा किया और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से भी मुलाकात की, जिसने राज्य की राजनीति में खलबली मचा दी है.
नाथवानी के नामांकन में एक फिल्मी मोड़ भी आया. नामांकन पत्रों की जांच के दौरान उनके नाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया. कुछ कागजातों में उनका नाम परिमल नाथवानी लिखा था तो कुछ में नाथवानी परिमल. इस गड़बड़ी पर विरोधी दलों ने आपत्ति दर्ज कराई और उनके नामांकन पर अंतिम फैसला कुछ समय के लिए लटक गया.
दूसरी तरफ बैद्यनाथ राम और प्रणव झा के नामांकन पूरी तरह सही पाए गए. भाजपा के इस कदम के बाद जेएमएम ने तुरंत चुनाव आयोग को पत्र लिखकर हॉर्स ट्रेडिंग की गंभीर आशंका जताई है. पार्टी का तर्क है कि विधानसभा में विपक्ष यानी भाजपा के पास सिर्फ 21 सदस्य हैं.
जबकि किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए कम से कम 28 प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत होती है. जेएमएम का दावा है कि उनके INDIA गठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं, इसलिए दोनों सीटें सीधे तौर पर उनकी ही होनी चाहिए.
मध्यप्रदेश : रिसॉर्ट पॉलिटिक्स का पुराना ठिकाना
मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को अपना उम्मीदवार बनाया है. जबकि भाजपा की तरफ से महेश केवट मैदान में हैं. तीन सीटों वाले इस राज्य में भाजपा का पलड़ा भारी है और गणित भी उनके पक्ष में दिख रहा है.
इसके बावजूद कांग्रेस ने कोई रिस्क न लेते हुए अपने विधायकों को बेंगलुरु शिफ्ट कर दिया है. यह वही पुरानी रणनीति है, जिसे कांग्रेस हर संकट के समय अपनाती है. विधायकों को किसी दूसरे राज्य के होटल या रिसॉर्ट में बंद कर दो, ताकि विरोधी दल के लोग उन तक पहुंच ही न पाएं.
मध्यप्रदेश के लिए यह रिसॉर्ट पॉलिटिक्स नई नहीं है. साल 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के कारण कांग्रेस अपनी चलती हुई सरकार गंवा चुकी है. उस पुराने जख्म का दर्द पार्टी आज भी भूली नहीं है, इसीलिए चुनाव की आहट मिलते ही विधायकों को बाहर भेजना अब उनकी मजबूरी बन चुका है.
कर्नाटक : खड़गे की साख का सवाल
कर्नाटक से कांग्रेस ने खुद पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पवन खेड़ा और मंसूर अली खान को मैदान में उतारा है. वहीं भाजपा ने यहां से प्रोफेसर डॉ. एम. नागराज पर दांव खेला है. चार सीटों वाले कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के पास पूरा बहुमत है.
लेकिन यह चुनाव खड़गे के लिए इज्जत का सवाल बन चुका ,है क्योंकि वे खुद उम्मीदवार हैं और पार्टी के सबसे बड़े नेता भी. यहां होने वाली कोई भी चूक उनके राष्ट्रीय कद को नुकसान पहुंचा सकती है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कर्नाटक में भी पर्दे के पीछे कुछ ऐसा चल रहा है जो अचानक चौंकाने वाले नतीजे दे सकता है.
गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश और पूर्वोत्तर का हाल
गुजरात की चार और राजस्थान की तीन सीटों पर भी चुनाव होने हैं. गुजरात में भाजपा के पास भारी बहुमत है, इसलिए वहां किसी बड़े उलटफेर की गुंजाइश न के बराबर है. राजस्थान में भी आंकड़े साफ हैं. इन राज्यों में मुकाबला इस बात का नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि इस बात का है कि कौन सी पार्टी अपने विधायकों को ज्यादा अनुशासन में रख पाती है.
दूसरी तरफ आंध्रप्रदेश की चार सीटों और अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय व मिजोरम की एक-एक सीट पर माहौल शांत है. आंध्रप्रदेश में सत्ता पक्ष मजबूत है और पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों में विधानसभा का गणित इतना साफ है कि वहां किसी भी तरह के राजनीतिक ड्रामे की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है.
असली खेल 18 जून की रात से पहले का है
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर साबित करता है कि राज्यसभा चुनाव की असली लड़ाई वोटिंग वाले दिन नहीं, बल्कि उससे पहले की रातों में लड़ी जाती है. अपने विधायकों को एकजुट रखना, उन्हें लालच और प्रलोभनों से बचाना और गठबंधन के साथियों का भरोसा जीतना ही इस समय हर राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. जेएमएम भले ही चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर यह दावा कर रही हो कि उनका गठबंधन दोनों सीटें जीतने के लिए तैयार है, लेकिन डर उनके भीतर भी साफ दिख रहा है.
18 जून को वोटिंग होगी, मतपेटियां खुलेंगी और नतीजे सबके सामने आ जाएंगे. लेकिन इस चुनाव की असली कहानी उन चर्चाओं में है जो रांची के बंद कमरों में हो रही हैं, उस बेचैनी में है जो बेंगलुरु के रिसॉर्ट में ठहरे विधायकों के चेहरों पर है, और उन गुप्त रणनीतियों में है जो दिल्ली के पार्टी दफ्तरों में देर रात तैयार की जा रही हैं. यही वह राजनीति है जो जनता को सीधे दिखती नहीं, लेकिन लोकतंत्र में सब कुछ यही तय करती है.
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