- वकीलों की मानसिकता को बताया ‘विनाशकारी’
- कोर्ट तक पहुंची कथित भाषण की रिकॉर्डिंग
- नोटिस मिला, फिर भी नहीं रखा पक्ष
- कोर्ट ने माना- आगे बढ़ने लायक है मामला
Ranchi News: रांची धार्मिक मंच से अधिवक्ता समुदाय को लेकर की गई कथित टिप्पणियां अब अदालत के समक्ष आ गया है. रांची सिविल कोर्ट के न्यायिक दंडाधिकारी सार्थक शर्मा की अदालत ने मानहानि के मामले में जैन मुनि सुधा सागर जी महाराज के विरुद्ध प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार पाते हुए समन जारी करने का आदेश दिया है. अदालत ने आरोपी की उपस्थिति के लिए मामला 9 सितंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है.
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मामले में अधिवक्ता प्रखर हरित ने शिकायतवाद दायर की है. आरोप है कि 31 अक्टूबर 2024 को मध्य प्रदेश में एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान मुनि सुधा सागर महाराज ने अधिवक्ताओं को जैन समितियों में शामिल करने से जुड़े सवाल के जवाब में पूरे अधिवक्ता वर्ग को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं. कार्यक्रम के टेलीविजन और इंटरनेट/सोशल मीडिया पर प्रसारित होने की बात भी शिकायत में दर्ज है.
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शिकायतवाद के मुताबिक मुनि पर अधिवक्ताओं को समितियों में शामिल नहीं करने की बात कहने और उनके कारण विवाद तथा विभाजन पैदा होने जैसी टिप्पणियां की है. अधिवक्ताओं की मानसिकता को कथित रूप से “Destructive” बताने तथा वकील द्वारा सत्य-असत्य से इतर अपने मुवक्किल को जिताने का प्रयास करने जैसी बातें कहने का भी आरोप लगाया गया है.
शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह किसी एक वकील पर की गई टिप्पणी नहीं थी, बल्कि पूरे अधिवक्ता समुदाय की पेशेवर प्रतिष्ठा पर असर डालने वाली टिप्पणी थी. शिकायत में दावा किया गया कि सार्वजनिक प्रसारण के कारण कथित बयान बड़े स्तर पर लोगों तक पहुंचा और इससे वकीलों के प्रति नकारात्मक धारणा पैदा हुई.
शिकायतकर्ता ने कथित भाषण की ऑडियो-वीडियो सामग्री वाली पेन ड्राइव भी न्यायालय में पेश की. हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि अभी इसकी प्रामाणिकता या अंतिम साक्ष्य मूल्य तय नहीं किया गया है और इस स्तर पर सामग्री को केवल यह देखने के लिए माना जा रहा है कि कार्यवाही आगे बढ़ाने का पर्याप्त आधार है या नहीं.
दरअसल , मामले में मुनि सुधा सागर महाराज को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था. इसके बावजूद प्रस्तावित आरोपी न तो उपस्थित हुए और न उनकी ओर से कोई जवाब दाखिल किया गया. इसके बाद अदालत ने शिकायतकर्ता, गवाह और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर मामले पर विचार किया.
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोप किसी एक अधिवक्ता की व्यक्तिगत आलोचना तक सीमित नहीं दिखाई देते, बल्कि अधिवक्ताओं को एक पेशेवर वर्ग के रूप में लेकर सामान्यीकृत आरोप लगाने की बात सामने आती है. अदालत के अनुसार, यदि ये आरोप आगे साक्ष्य से स्थापित होते हैं तो उनमें अधिवक्ताओं की पेशेवर एवं बौद्धिक छवि को दूसरों की नजर में कम करने की क्षमता है.
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