Ranchi : यूनिसेफ और स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त तत्वावधान में उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की समय पर पहचान, उपचार और रेफरल को लेकर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन सिविल सर्जन कार्यालय सभागार में किया गया. कार्यशाला का उद्देश्य मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए जमीनी स्तर पर कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता को मजबूत करना था.
कार्यशाला को संबोधित करते हुए सिविल सर्जन डॉ प्रभात कुमार ने कहा कि प्रसव पूर्व जांच के दौरान ही उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान अत्यंत आवश्यक है.
इसके लिए नियमित रूप से ब्लड प्रेशर, शुगर, एचआईवी, एसटीआई और अल्ट्रासोनोग्राफी जैसी जांच अनिवार्य रूप से कराई जानी चाहिए.
उन्होंने बताया कि एंटी पार्टम हेमरेज, पोस्ट पार्टम हेमरेज, प्री-इक्लैंपसिया, एक्लैंपसिया, यूटरिन रप्चर, सेप्टिक शॉक और प्लेसेंटा परक्रेटा मातृ मृत्यु के प्रमुख कारण हैं, जिनका समय पर निदान होने से जान बचाई जा सकती है.
कार्यक्रम में चिकित्सक डॉ असीम कुमार मांझी ने गर्भावस्था के दौरान संतुलित पोषण और चिकित्सकीय परामर्श से आयरन गोली लेने की आवश्यकता पर जोर दिया.
मातृ स्वास्थ्य कंसल्टेंट अन्नू कुमारी ने गर्भावस्था के दौरान दिखाई देने वाले खतरे के चिन्हों पर विस्तार से जानकारी दी. राज्य पोषण कंसल्टेंट प्रतिभा सिंह ने बताया कि लगभग 15 प्रतिशत गर्भावस्थाएं उच्च जोखिम की श्रेणी में आती हैं.
यूनिसेफ की प्रतिनिधि अन्नपूर्णा ने प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान को प्रभावी ढंग से लागू करने की रणनीतियों पर चर्चा की और सामूहिक प्रयासों पर बल दिया.
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