Ranchi News : कहते हैं कि आस्था के रास्ते पर चलने के लिए उम्र नहीं,बल्कि मन में सच्ची श्रद्धा होनी चाहिए. जब किसी के दिल में मां दुर्गा के प्रति अटूट विश्वास हो, तो मिट्टी का एक छोटा-सा टुकड़ा भी भक्ति का स्वरूप ले लेता है. रांची के हातामा निवासी अविनाश मुंडा (21वर्षीय) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है.
इसे भी पढ़ें...
बचपन में मिट्टी से छोटी-छोटी प्रतिमाएं बनाकर खेलने वाले अविनाश को शायद उस वक्त एहसास भी नहीं था कि यही खेल एक दिन उनकी पहचान बन जाएगा. आज वहीं मिट्टी उनके हाथों में आकार ले चुका है.
आज मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा बनाने में महारत हासिल कर ली है. उनका घर श्रद्धा, साधना और भक्ति का केंद्र बन गया है. सीमित संसाधनों के बावजूद अविनाश सच्चे मन से मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने और उनकी पूजा हर साल करते है.
अविनाश की शिक्षा-दीक्षा
2025 में गोसनर कोलेज से इंटर की पढ़ाई की है. इससे पहले बिरसा सकुल से दसवीं में द्वितीय श्रेणी से उतीर्ण किया. वर्तमान में कंप्यूटर की शिक्षा लेने क्लास करने जाते है.
बचपन के खेल ने बनाया मां का भक्त और गोस्सनर कॉलेज का छात्र
छात्र अविनाश मुंडा बताते हैं कि बचपन में वह अपने साथ के बच्चों के साथ मिट्टी से छोटी-छोटी मूर्तियां बनाया करते थे. झोपड़ी में उन प्रतिमाओं को स्थापित कर पूजा-अर्चना करते थे. उस समय यह सब बच्चों के खेल जैसा था, लेकिन धीरे-धीरे इसी खेल ने उन्हें प्रतिमा बनाने की कला सिखा दी.
हाथों में मिट्टी को आकार देने का हुनर निखरता गया और मां दुर्गा के प्रति उनकी श्रद्धा और गहरी होती गई. देखते ही देखते मिट्टी से प्रतिमा बनाने का शौक उनके जीवन का अहम हिस्सा बन गया. पिछले आठ वर्षों से वह स्वयं मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार कर रहे हैं.
घर का आंगन बना मां दुर्गा का दरबार
नवरात्र आते ही अविनाश के घर का माहौल बदल जाता है. घर का आंगन मां दुर्गा के स्वागत की तैयारियों से भर जाता है. घर के आंगन में वह करीब 15 फीट ऊंचा पंडाल तैयार करते हैं, जिसमें मां दुर्गा की सात फीट की प्रतिमा स्थापित की जाती है.
पंडाल की चौड़ाई करीब 10 फीट होती है. इस प्रतिमा की खासियत यह है कि अविनाश एक ही फ्रेम में मां दुर्गा के साथ मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमाएं तैयार करते हैं.
नौ दिनों तक मां की भक्ति में लीन रहते हैं अविनाश मुंडा
छात्र अविनाश मुंडा ने बताया कि उनके लिए दुर्गापूजा केवल उत्सव नहीं, बल्कि नौ दिनों की साधना भी है. नवरात्र के दौरान वह उपवास रखते हैं. दिनभर अन्न ग्रहण नहीं करते है. शाम को खीर, दूध और केला खाकर व्रत पूरा करते हैं. वह बताते हैं कि दुर्गा पूजा नजदीक आते ही उन्हें ठीक से नींद भी नहीं आती.
मन में बार-बार यही चिंता रहती है कि मां की प्रतिमा समय पर तैयार हो जाए और पंडाल में विधिवत स्थापित हो जाए. साथ ही पूजा में कोई कमी न रह जाए. पूजा के छष्ठमी से लेकर दशमी तक पुरोहित को बुलाकर विधि-विधान से अनुष्ठान कराया जाता है.
मुख्यमंत्री से मिल चुका है सम्मान
अविनाश की गहरी श्रद्धा और मूर्ति कला को पहचान भी मिल चुकी है. वह बताते हैं कि दुर्गापूजा के अवसर पर प्रतिमा बनाने की जानकारी मिलने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है.
अष्टमी और नवमी के अवसर पर अविनाश के घर में विशेष पूजा की तैयारी रहती है. कन्या पूजन के दौरान छोटी बच्चियों को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उन्हें प्रसाद खिलाया जाता है और उपहार दिए जाते हैं.
आस्था की डोर से बंधे हैं श्रद्धालु
अविनाश के पंडाल में ऐसे श्रद्धालु भी पहुंचते हैं, जो मां दुर्गा के प्रति अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं. वह बताते हैं कि कुछ लोग पूजा-अर्चना के बाद अपनी मनोकामना पूरी होने पर दोबारा पंडाल में माथा टेकने और सहयोग करने पहुंचते हैं.
Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.


