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झारखंड में किसानों की कमाई होगी दुगनी, ‘कार्बन ट्रेडिंग’ को लेकर वन विभाग की रोडमैप तैयार

Ranchi News: पेड़-पौधे हवा से कार्बन-डाइऑक्साइड सोखकर प्रदूषण कम करते हैं. वैज्ञानिक तरीकों से जब इस सोखे गए कार्बन की मात्रा मापी जाती है, तो इसके बदले ‘कार्बन क्रेडिट’ मिलते हैं. दुनिया भर की बड़ी औद्योगिक कंपनियां अपने प्रदूषण की भरपाई के लिए इन कार्बन क्रेडिट्स को पैसे देकर खरीदती हैं. इसी खरीद-बिक्री को ‘कार्बन ट्रेडिंग’ कहा जाता है.
 
‘क्लाइमेट हजार्ड मैपिंग’ रिपोर्ट लॉन्च
Ranchi News: झारखंड में अब पर्यावरण संरक्षण और पौधरोपण केवल हरियाली बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे किसानों और ग्रामीणों की सीधी कमाई भी होगी. राज्य को जलवायु परिवर्तन के खतरों से सुरक्षित बनाने और ग्रामीणों को ‘कार्बन मार्केट’ से जोड़ने के लिए वन विभाग ने बड़ी पहल की है.
 
शुक्रवार को रांची के होटल चाणक्य बीएनआर में ‘क्लाइमेट रेसिलिएंट झारखंड’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में इस योजना का रोडमैप तैयार किया गया. इस मौके पर राज्य के लिए ‘क्लाइमेट हजार्ड मैपिंग फॉर झारखंड’ रिपोर्ट का भी विमोचन किया गया.

क्या है कार्बन ट्रेडिंग और कैसे होगा ग्रामीणों को फायदा

आसान शब्दों में समझें तो पेड़-पौधे हवा से कार्बन-डाइऑक्साइड सोखकर प्रदूषण कम करते हैं. वैज्ञानिक तरीकों से जब इस सोखे गए कार्बन की मात्रा मापी जाती है, तो इसके बदले ‘कार्बन क्रेडिट’ मिलते हैं. दुनिया भर की बड़ी औद्योगिक कंपनियां अपने प्रदूषण की भरपाई के लिए इन कार्बन क्रेडिट्स को पैसे देकर खरीदती हैं.
 
इसी खरीद-बिक्री को ‘कार्बन ट्रेडिंग’ कहा जाता है. झारखंड के किसान और जनजातीय समुदाय जब अपनी जमीन पर कृषि वानिकी (पेड़ लगाना) और जलवायु अनुकूल खेती करेंगे, तो उससे बनने वाले कार्बन क्रेडिट को बेचकर उन्हें अतिरिक्त आर्थिक लाभ दिलाया जाएगा.

राज्य में 69 फीसदी भूमि क्षरण की चुनौती

कार्यशाला में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन बल प्रमुख) संजीव कुमार ने कहा कि कार्बन ट्रेडिंग पर्यावरण बचाने के साथ स्थानीय आजीविका बढ़ाने का सशक्त माध्यम है. उन्होंने इसरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि झारखंड में करीब 69 प्रतिशत भूमि क्षरण (मिट्टी की गुणवत्ता घटने) की गंभीर चुनौती है. इससे निपटने के लिए उन्होंने उद्योग, खनन और ऊर्जा विभागों के आपसी समन्वय से जल संरक्षण, पौधरोपण और बायोगैस को बढ़ावा देने पर जोर दिया.

उपग्रह से होगी निगरानी, नाबार्ड करेगा मदद

पीसीसीएफ (वाइल्डलाइफ) रवि रंजन ने वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर कार्बन परियोजनाएं विकसित करने की बात कही. वहीं, नाबार्ड के डीजीएम राकेश सिन्हा ने बताया कि योजनाओं और वित्तीय सहयोग के जरिए किसानों तक कार्बन वित्त (फंड) पहुंचाया जाएगा. कार्यशाला में उपग्रह चित्रों (सैटेलाइट इमेज) के जरिए मिट्टी और पेड़ों में जमा कार्बन को मापने वाले डिजिटल उपकरण (dMRV) का भी प्रदर्शन किया गया.
इस अवसर पर पूर्व पीसीसीएफ डॉ. एचएस गुप्ता, पीसीसीएफ (वेटलैंड) एटी मिश्रा, डीएफओ अनुराधा मिश्रा, क्लाइमेटेक्स के निदेशक विजय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, जेएसएलपीएस, हिंडाल्को और एक्सएलआरआई सहित कई संस्थाओं के प्रतिनिधि मौजूद रहें.
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