Ranchi: झारखंड के राज्यसभा चुनाव ने राजनीतिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है. भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के चुनावी मैदान में उतरने से मुकाबला अब केवल संख्या बल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक रणनीति और विधायकों की एकजुटता की भी परीक्षा बन गया है.
विधानसभा में एनडीए के पास 24 विधायकों का समर्थन है, जबकि राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 मतों की आवश्यकता है. ऐसे में नाथवानी खेमे की नजर उन विधायकों पर टिकी है जो चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं. राजनीतिक सूत्रों के अनुसार नाथवानी के समर्थक विभिन्न दलों के नेताओं और विधायकों से लगातार संपर्क बनाए हुए हैं.
दूसरी तरफ कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा और झामुमो उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की जीत सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले महागठबंधन पर आ गई है. गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सभी सहयोगी दलों को एकजुट रखना और किसी भी तरह की क्रॉस वोटिंग की संभावना को समाप्त करना है.
नामांकन प्रक्रिया के दौरान सामने आए घटनाक्रम ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी है. कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों और सहयोगी दलों की अपेक्षाकृत शांत भूमिका को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. राजद और वाम दलों के कुछ नेताओं ने उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को लेकर अपनी नाराजगी भी जाहिर की है, जिससे राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है.
झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव पहले भी कई बार अप्रत्याशित परिणामों और राजनीतिक उठापटक का गवाह रहा है. वर्ष 2008 में परिमल नाथवानी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया था. यही वजह है कि इस बार भी उनके चुनावी अभियान को हल्के में नहीं लिया जा रहा है.
फिलहाल चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि राज्यसभा चुनाव ने झारखंड की राजनीति में रोमांच बढ़ा दिया है. आने वाले दिनों में विधायकों की गोलबंदी और राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है.
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