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Ranchi News: IIM रांची के प्रशासनिक अधिकारी को HC से राहत, सेवा से हटाए जाने का आदेश रद्द

Ranchi : इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (IIM) रांची के तत्कालीन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शिव प्रताप वर्मा को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की कोर्ट ने 09.08.2024 का उन्हें सेवा से हटाए जाने के आदेश को रद्द कर दिया. साथ ही 18.01.2025 का अपीलीय आदेश भी रद्द कर दिया.
 

Ranchi : इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (IIM) रांची के तत्कालीन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शिव प्रताप वर्मा को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की कोर्ट ने 09.08.2024 का उन्हें सेवा से हटाए जाने के आदेश को रद्द कर दिया. साथ ही 18.01.2025 का अपीलीय आदेश भी रद्द कर दिया.


याचिकाकर्ता को सेवा में पुनः बहाल करने का आदेश दिया. कोर्ट ने मामले में निर्देश दिया है कि नई जांच किसी स्वतंत्र बाहरी निकाय या एडहॉक डिसीप्लिनरी कमेटी से करने को कहा है. पहले Whistle Blowers Protection Act, 2014 की धारा 11 के तहत सक्षम प्राधिकारी यह तय करेगा कि विभागीय कार्यवाही प्रतिशोध है या नहीं. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स एवं अधिवक्ता शिवम पाठक ने पक्ष रखा. 

 

दरअसल, याचिकाकर्ता ने 21.10.2022 को सेंट्रल विजिलेंस कमिशन के समक्ष PIDPI (Public Interest Disclosure) के तहत भर्ती एवं वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत की थी. बाद में 21.07.2023 को दूसरी शिकायत भी की. आरोप लगाया था कि उनकी पहचान उजागर कर दी गई और उसके बाद उन्हें निशाना बनाया गया. इसके बाद संस्थान ने उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी.

 

उन पर कई तरह के आरोप लगाए गए थे, जिनमें नियुक्ति आवेदन में गलत एवं भ्रामक जानकारी देना, नौकरी के दौरान निजी रोजगार के लिए बातचीत करना,  उच्च अधिकारियों को दरकिनार करके सरकार एवं अन्य प्राधिकारियों को शिकायत भेजना और सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करना, बाहरी एवं राजनीतिक प्रभाव का उपयोग करना, अधिकारियों को धमकाना, पत्नी के साथ निजी व्यावसायिक हितों का खुलासा नहीं करना आदि शामिल थे. 

 

मामले में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा भ्रष्टाचार की शिकायतें विभागीय कार्यवाही शुरू होने से पहले की गई थीं. इसलिए यह जांचना आवश्यक था कि विभागीय कार्यवाही कहीं उसकी शिकायतों का प्रतिशोध तो नहीं है. निदेशक स्वयं आरोपों के दायरे में थे.

 

अदालत ने गंभीर टिप्पणी की कि भर्ती में भ्रष्टाचार के आरोप स्वयं निदेशक तक पहुंचते हैं, जबकि वही व्यक्ति दंड देने वाला प्राधिकारी भी बना हुआ था. इससे निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा. विभागीय कार्यवाही प्रतिशोधपूर्ण प्रतीत होती है. न्यायालय ने माना कि यह संभावना नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि विभागीय कार्यवाही प्रतिशोध स्वरूप शुरू की गई हो.

 

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