Ranchi: रांची विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (ILS) में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के मानकों की लगातार अनदेखी का मामला झारखंड हाईकोर्ट तक पहुंच गया है. जिसके बाद कोर्ट ने सत्र 2026 – 2027 के नामांकन पर रोक लगा दी है. विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही को वर्षवार समझने पर पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाता है.

वर्ष 2024:
30 जुलाई 2024 को BCI ने विश्वविद्यालय को पत्र जारी कर स्पष्ट चेतावनी दी थी कि ILS में मौजूद सभी कमियों को जल्द से जल्द दूर किया जाए, अन्यथा 2025-26 सत्र से एडमिशन नहीं ली जा सकती.
15 अक्टूबर 2024 को तत्कालीन कुलपति अजीत कुमार सिंहा ने 5 सदस्यीय एक compliance कमेटी का गठन किया. जिसमें डीन फैकल्टी लॉ, डायरेक्टर CVS, तत्कालीन डायरेक्टर एस.एन.मिश्रा, स्मृति सिंह, तत्कालीन DR 1 प्रीतम कुमार को शामिल किया गया. कमेटी को एक सप्ताह में रिपोर्ट सौंपनी थी.
लेकिन बड़े आश्चर्य की बात है कि न तो कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, न ही इंस्टीट्यूट में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए compliances किए गए और न ही 2025-2026 बैच का एडमिशन रोका गया. विश्वविद्यालय ने अपने स्तर पर BCI के आदेश का अवहेलना करते हुए 2025-26 का एडमिशन लेकर बच्चों के भविष्य को अधर में लटकाने का काम किया.
BCI ने इस दौरान जिन प्रमुख कमियों की ओर ध्यान दिलाया, उनमें कम से कम 10 लॉ के फैकल्टी का ना होना, एक भी स्थायी शिक्षक का ना होना, लॉ में पीएचडी युक्त स्थायी निदेशक की नियुक्ति न होना, आधुनिक मूट कोर्ट का अभाव, कंप्यूटरयुक्त और पर्याप्त पुस्तकों-जर्नल वाली लाइब्रेरी का न होना, तथा छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग कॉमन रूम (अटैच वॉशरूम सहित) का अभाव, स्पोर्ट्स के लिए उचित प्रबन्ध ना होना आदि शामिल था.

वर्ष 2025:
पूरे वर्ष बीत जाने के बावजूद संस्थान की स्थिति जस की तस बनी रही. BCI के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद विश्वविद्यालय ने न तो कमियां दूर कीं और न ही चेतावनी का पालन किया. इसके उलट, 2025 बैच में एडमिशन भी ले लिया गया.
इस दौरान ILS के छात्रों ने कई बार तालाबंदी कर विरोध प्रदर्शन किया और विश्वविद्यालय प्रशासन से BCI मानकों के पालन की मांग की, लेकिन प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और छात्रों को लगातार अनिश्चितता में रखा.
वर्ष 2026:
लगातार अनदेखी और समस्याओं से परेशान होकर ILS के छात्र— अम्बेश चौबे, आर्यन देव, देवेश तिवारी और तुषार दुबे ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आनंदा सेन की पीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए नए एडमिशन पर पूर्ण रोक लगा दी.
कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि जब तक BCI मानकों के अनुरूप बुनियादी सुविधाएं - जैसे लाइब्रेरी, मूट कोर्ट, कॉमन रूम, खेल मैदान उपलब्ध नहीं कराई जातीं और कम से कम 10 योग्य लॉ शिक्षकों की नियुक्ति तथा लॉ में पीएचडी योग्य स्थायी निदेशक की बहाली नहीं होती, तब तक किसी भी नए बैच में नामांकन नहीं किया जाएगा.
मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अनूप कुमार अग्रवाल ने पक्ष रखा, जबकि विश्वविद्यालय की ओर से अधिवक्ता अनूप कुमार मेहता उपस्थित हुए.
इंस्टीच्यू ऑफ लीगल स्ट्डीज खुले हुए, लगभग 7 साल हो चुके हैं. हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब विश्वविद्यालय प्रशासन पर आवश्यक सुधार करने का दबाव बढ़ गया है. हालांकि, मौजूदा स्थिति में 420 छात्रों का भविष्य पूर्णतः अधर में लटका हुआ है, क्योंकि जिन सुधारों को विश्वविद्यालय को स्वयं पहले ही कर लेना चाहिए था.
उनकी अनदेखी के कारण अब स्थिति न्यायिक हस्तक्षेप तक पहुंच गई है. अब देखना ये है कि अगली तारीख 9 अप्रैल 2026 तक विश्वविद्यालय स्थिति में क्या सुधार करती है.
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