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रांची का ऐसा पहला दुर्गा मंदिर, जहां रथ मेला से ही शुरू होती है मां की प्रतिमाओं का निर्माण

Ranchi News: मंदिर की खासियत यह है कि यहां मां दुर्गा समेत अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं मंदिर परिसर में ही तैयार की जाती हैं. यहां पर जगन्नाथ मेला के दिन से प्रतिमाओं का बनना शुरू होता है. इस बार मंदिर अपनी स्थापना के करीब 200 साल का सफर तय करेगा. कई वर्षों पहले इस मंदिर में भव्य दुर्गापूजा मेला लगता था. उस समय मंदिर को साल में केवल 20 दिनों के लिए खोला जाता था,
 
मंदिर की तस्वीर
  • -200 साल पुराना है मुकुंददानी मंदिर
  • -अनूठी स्थापत्य कला और सनातन परंपरा के लिए है प्रसिद्ध
  • -चूना-सुर्खी और गुड़ से हुआ है निर्माण

Ranchi News: राजधानी के डेली मार्केट स्थित दानी बाबु लेन स्थित दुर्गा मंदिर दुर्गापूजा की परंपरा और आस्था का इतिहास करीब 200 साल पुराने धर्म प्रचारिणी सभा के दुर्गा मंदिर से जुड़ा है. यह मंदिर करीब 1826 में बनाया गया था. मुकुंददानी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर अपनी प्राचीन परंपराओं, अनूठी स्थापत्य कला और विशिष्ट पूजा पद्धति के लिए जाना जाता है.

 

मंदिर की खासियत यह है कि यहां मां दुर्गा समेत अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं मंदिर परिसर में ही तैयार की जाती हैं. यहां पर जगन्नाथ मेला के दिन से प्रतिमाओं का बनना शुरू होता है. इस बार मंदिर अपनी स्थापना के करीब 200 साल का सफर तय करेगा. कई वर्षों पहले इस मंदिर में भव्य दुर्गापूजा मेला लगता था. उस समय मंदिर को साल में केवल 20 दिनों के लिए खोला जाता था, जबकि बाकी 340 दिन यह बंद रहता था. करीब वर्ष 2000 में मंदिर की वेदी पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई.

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जगन्नाथ मेला से शुरू होता है प्रतिमा निर्माण

मुकुंददानी मंदिर में प्रतिमा निर्माण की परंपरा भी खास है. जगन्नाथ मेला के दिन से प्रतिमाएं बनाने का काम शुरू होता है. यहां पर सबसे पहले भगवान गणेश की प्रतिमा तैयार की गई थी. इसके बाद मां दुर्गा, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमाएं बनाई गई हैं. मंदिर में ही प्रतिमाओं का निर्माण होने से यहां की परंपरा अन्य दुर्गा पूजा स्थलों से अलग पहचान रखती है.

 

चट्टानों को काटकर तैयार की गई मंदिर की जमीन

मंदिर की बनावट भी इसकी प्राचीनता की कहानी बयां कर रही है. मंदिर के नीचे पूरी जमीन चट्टानी है. मंदिर निर्माण के लिए बड़े-बड़े पत्थरों को काटकर जमीन को समतल किया गया था. करीब चार डिसमिल जमीन पर मंदिर और परिसर तैयार किया गया. मंदिर की ऊंचाई करीब 30 फीट और चौड़ाई लगभग 100 फीट है.

 

चूना-सुर्खी और गुड़ से बनी दीवारें

मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में इसका निर्माण भी शामिल है. इसकी दीवारें चूना, सुर्खी और गुड़ के मिश्रण से तैयार की गई हैं. मंदिर के निर्माण में सीमेंट और लोहे की छड़ों का इस्तेमाल नहीं किया गया. मंदिर की वेदी के सामने पत्थर का विशाल स्तंभ भी है. इसपर हाथों से नक्काशी की गई है. मंदिर की संरचना पर मोर, हाथी, फूल-पत्तियों समेत कई तरह की आकृतियां उकेरी गई हैं, जो इसकी पारंपरिक शिल्पकला को दर्शाई गई हैं.

 

वेदी से उतारी जाएगी प्रतिमा, दक्षिणमुखी रूप में होगी पूजा

मंदिर की पूजा परंपरा में मां दुर्गा के दक्षिणमुखी स्वरूप का विशेष महत्व है. सामान्य दिनों में वेदी पर स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा को दुर्गोत्सव के दौरान उतारकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है. इस स्वरूप को दक्षिणमुखी दुर्गा कहा जाता है. मान्यता के अनुसार, मां का यह स्वरूप रौद्र रूप से जुड़ा है और इसकी पूजा को कठिन माना जाता है.

 

संधि बलि में चढ़ाए गए फलों की भी होती है कटाई

19 अक्टूबर को सुबह 7 बजे मंदिर परिसर पर संधि बलि दी जाएगी. इस दौरान तलवार से कतारी, बथुआ और श्रद्धालुओं की ओर से लाए गए फलों को काटने की परंपरा है. यह अनुष्ठान करीब 10 से 15 मिनट तक चलता रहता है. मंदिर में संधि बलि की यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व है.

 

मंदिर में स्थापित हैं 66 योगिनियां

मंदिर की धार्मिक विशेषताओं में 66 योगिनियों की स्थापना भी शामिल है. मंदिर बनाने के समय भगवान महादेव की प्रतिमा भी स्थापित की गई थी. भोलेनाथ की प्रतिमा मां दुर्गा के ठीक ऊपर दीवार पर स्थित है. इस तरह मंदिर में मां दुर्गा के साथ भगवान शिव और योगिनियों की उपस्थिति के कारण प्राचीन परंपरा को विशेष पहचान बनाकर रखा गया है.

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