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रिटायर सुपरवाइजर वेतनमान विवाद : कांके के स्टेट बेकन फैक्ट्री के GM का आदेश हाईकोर्ट से रद्द

कोर्ट-कचहरी की खबरें
  • कोर्ट ने 12 सप्ताह में नया कारणयुक्त आदेश देने का दिया निर्देश
  • प्रशासनिक आदेशों में स्पष्ट और ठोस कारण देना अनिवार्य है, केवल औपचारिक कारण वैध निर्णय नहीं माने जा सकते

Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य के बेकन फैक्ट्री, कांके से सेवानिवृत्त सुपरवाइजर (मैकेनिकल) काशीनाथ गांगुली के वेतनमान विवाद में फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की कोर्ट ने जनरल मैनेजर, स्टेट बेकन फैक्ट्री, कांके, रांची विभाग द्वारा 4 मार्च 2021 को पारित आदेश को रद्द कर दिया है. 

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कोर्ट ने कहा कि विभाग ने याचिकाकर्ता की आपत्तियों और दावों पर विचार किए बिना केवल पुराने विभागीय पत्र का हवाला देकर उनका दावा खारिज कर दिया, जो कानून की दृष्टि में कारणयुक्त (Reasoned Order) नहीं माना जा सकता.


कोर्ट ने 4 मार्च 2021 के जनरल मैनेजर, स्टेट बेकन फैक्ट्री रांची के आदेश को रद्द करते हुए मामले को संबंधित प्राधिकारी के पास वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन में उठाए गए सभी बिंदुओं पर विचार कर 12 सप्ताह के भीतर कानून के अनुरूप नया, कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए.

 

हालांकि अदालत ने सीधे 6500-10500 रुपये का वेतनमान देने का आदेश नहीं दिया, बल्कि मामले पर नए सिरे से विचार कर विधिसम्मत निर्णय लेने का निर्देश दिया. कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से निष्पादित कर दिया.

 

दरअसल, याचिकाकर्ता ने वर्ष 1984 में सुपरवाइजर (मैकेनिकल) के रूप में सेवा शुरू की थी. उन्हें समयबद्ध प्रोन्नति के बाद पहले 5000-8000 रुपये और बाद में विभागीय आदेश के जरिए 6500-10500 रुपये का वेतनमान दिया गया था. लेकिन वर्ष 2007 में विभाग ने यह कहते हुए उनका वेतनमान घटाकर 5500-9000 रुपये कर दिया कि उनका पद एकल है और उन्हें उच्च वेतनमान गलती से दिया गया था. साथ ही अतिरिक्त भुगतान की वसूली का भी आदेश दिया गया.

 

इस आदेश को पहले भी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. बाद में एलपीए (LPA No. 397 of 2018) में मामला सक्षम प्राधिकारी को दोबारा सुनवाई कर निर्णय लेने के लिए भेजा गया था. इसके बाद विभाग ने 4 मार्च 2021 को फिर से याचिकाकर्ता का दावा खारिज कर दिया.

 

हाईकोर्ट ने पाया कि विभाग ने याचिकाकर्ता के 12 फरवरी 2021 के विस्तृत प्रतिवेदन में उठाए गए किसी भी तर्क पर विचार नहीं किया और केवल 3 अक्टूबर 2007 के विभागीय पत्र का पालन करने की बात कहकर आवेदन अस्वीकार कर दिया. अदालत ने इसे यांत्रिक और पूर्वनिर्धारित निर्णय बताते हुए कहा कि प्रशासनिक आदेशों में स्पष्ट और ठोस कारण देना अनिवार्य है.

 

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Kranti Associates Pvt. Ltd. बनाम Masood Ahmed Khan (2010) 9 SCC 496 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय में स्पष्ट, ठोस और संक्षिप्त कारण होना आवश्यक है. केवल औपचारिक या "रबर स्टांप" जैसे कारण वैध निर्णय नहीं माने जा सकते.

 

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