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बिटुमेन की कीमतों में उछाल से सड़क निर्माण कार्य प्रभावित, चैंबर ने जताई चिंता

फेडरेशन ऑफ झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज एवं बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, झारखंड चैप्टर द्वारा गुरुवार को चैंबर भवन में संयुक्त प्रेस वार्ता आयोजित की गई. इस दौरान निर्माण क्षेत्र में उत्पन्न गंभीर चुनौतियों को लेकर विस्तार से चर्चा की गई. चैंबर अध्यक्ष आदित्य मल्होत्रा ने कहा कि खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध और मटेरियल की कमी के कारण कंस्ट्रक्शन सेक्टर पर गंभीर असर पड़ा है.
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Ranchi : फेडरेशन ऑफ झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज एवं बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, झारखंड चैप्टर द्वारा गुरुवार को चैंबर भवन में संयुक्त प्रेस वार्ता आयोजित की गई. इस दौरान निर्माण क्षेत्र में उत्पन्न गंभीर चुनौतियों को लेकर विस्तार से चर्चा की गई. चैंबर अध्यक्ष आदित्य मल्होत्रा ने कहा कि खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध और मटेरियल की कमी के कारण कंस्ट्रक्शन सेक्टर पर गंभीर असर पड़ा है. 

 

उन्होंने बताया कि बिटुमेन की कीमत 40 हजार रुपये प्रति टन से बढ़कर 54 हजार रुपये प्रति टन हो गई है, जिससे पहले से कार्यादेश ले चुके संवेदकों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.

 

उन्होंने कहा कि झारखंड में केवल बोकारो में ही कंटेनर डिपो है, जहां भी पर्याप्त आपूर्ति नहीं है. ऐसे में हल्दिया से बिटुमेन मंगाना पड़ता है, जिससे लागत और बढ़ जाती है. उन्होंने राज्य में और कंटेनर डिपो स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया.

 

साथ ही, कॉमर्शियल डीजल की कीमत में 22 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि से लॉजिस्टिक्स लागत भी बढ़ गई है. बिटुमेन की कमी के कारण सड़क निर्माण कार्य लगभग 50 प्रतिशत तक सीमित हो गया है.

 

मल्होत्रा ने सरकार से मांग की कि जैसे देश में क्रूड ऑयल का 90 दिनों का भंडारण रखा जाता है, उसी तरह राज्य स्तर पर भी रिजर्व व्यवस्था विकसित की जाए.

 

वहीं, बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, झारखंड चैप्टर के चेयरमैन रविराज अग्रवाल ने बताया कि पिछले तीन महीनों से बोकारो स्थित IOCL, BPCL और HPCL डिपो से बिटुमेन की आपूर्ति नहीं हो रही है, जबकि हल्दिया से भी सप्लाई बाधित है. उन्होंने कहा कि हर साल फरवरी-मार्च में कार्य के समय कृत्रिम कमी उत्पन्न हो जाती है.

 

उन्होंने बताया कि पिछले तीन महीनों में बिटुमेन की कीमत में करीब 15 हजार रुपये प्रति टन की वृद्धि हुई है, जिससे संवेदकों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है. साथ ही इलेक्ट्रिकल गुड्स और वायर के दाम भी लगभग डेढ़ गुना बढ़ गए हैं.

 

अग्रवाल ने मांग की कि मूल्य वृद्धि का भार सरकार वहन करे और झारखंड में ऑयल कंपनियों के बल्क बिटुमेन डिपो स्थापित किए जाएं, ताकि राज्य की निर्भरता हल्दिया पर खत्म हो सके. उन्होंने बिटुमेन की कीमतों में अनावश्यक वृद्धि पर रोक लगाने और निजी कंपनियों को भी आपूर्ति की अनुमति देने की मांग की.

 

बिल्डर्स एसोसिएशन के अशोक प्रधान ने कहा कि फरवरी से अब तक बिटुमिन की दरों में 30 से 35 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है. राज्य में एक भी बल्क बिटुमेन डिपो नहीं होने के कारण भुगतान के बावजूद सामग्री उपलब्ध नहीं हो पा रही है.

 

उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड गठन के 26 वर्ष बाद भी राज्य में एक भी रिफाइनरी नहीं है. उन्होंने हल्दिया की तर्ज पर रांची में टर्मिनल डिपो स्थापित करने की मांग की. साथ ही उन्होंने बताया कि रिलायंस की उच्च गुणवत्ता वाली रिफाइनरी के उत्पाद झारखंड में अनुमोदित नहीं हैं, जिससे विकल्प सीमित हो जाते हैं.

 

प्रधान ने कहा कि ग्रामीण विकास कार्यों में लगे छोटे संवेदक, जो 5-7 प्रतिशत मार्जिन पर काम करते हैं, इस स्थिति में गंभीर आर्थिक दबाव का सामना कर रहे हैं.

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