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झारखंड के विवि में सेल्फ-फाइनेंस्ड कोर्स के लिए बदले नियम, दाखिले से नियुक्ति तक नई व्यवस्था

Ranchi News : सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों में शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति अथवा अनुबंध में राज्य सरकार की आरक्षण नीति लागू नहीं होगी. अनुबंध की अवधि समाप्त होने के बाद संबंधित कर्मचारी आगे नियुक्ति का दावा नहीं कर सकेंगे.
 
प्रतीकात्मक चित्र

Ranchi News : झारखंड के राज्य विश्वविद्यालयों में संचालित होने वाले सेल्फ-फाइनेंस्ड (स्व-वित्तपोषित) पाठ्यक्रमों के संचालन को लेकर राज्य सरकार ने नए नियम लागू कर दिए हैं. नए प्रावधानों के तहत ऐसे पाठ्यक्रमों का पूरा खर्च विद्यार्थियों से प्राप्त फीस और अन्य गैर-सरकारी स्रोतों से पूरा किया जाएगा. राज्य सरकार इन पाठ्यक्रमों के लिए किसी प्रकार की आवर्ती या अनावर्ती वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं कराएगी.

 

सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर अलग-अलग सेंटर स्थापित किए जाएंगे. इन सेंटरों के माध्यम से बाहरी विद्यार्थियों के लिए चार वर्षीय स्नातक, एक एवं दो वर्षीय स्नातकोत्तर, सर्टिफिकेट और डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित किए जा सकेंगे. नियमित विद्यार्थियों के लिए इलेक्टिव, स्पेशलाइजेशन और रिसर्च आधारित पाठ्यक्रम शुरू करने की भी अनुमति होगी. इन पाठ्यक्रमों से संबंधित शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय गतिविधियों को निर्धारित व्यवस्था के तहत संचालित किया जाएगा.

 

सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों में नामांकन चांसलर पोर्टल अथवा राज्य सरकार द्वारा निर्धारित कॉमन एडमिशन पोर्टल के माध्यम से किया जाएगा. प्रवेश प्रक्रिया में झारखंड की आरक्षण नीति लागू होगी.

 

चार वर्षीय यूजी, एक एवं दो वर्षीय पीजी और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों को नियमित छात्रों के समान कई अधिकार और सुविधाएं मिलेंगी. उन्हें विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने के साथ-साथ विश्वविद्यालय चुनाव में मतदान का अधिकार भी होगा. शिकायत निवारण, एंटी-रैगिंग और अन्य छात्र कल्याण संबंधी व्यवस्थाएं भी इन विद्यार्थियों पर लागू होंगी.

 

इन पाठ्यक्रमों के लिए फुल-टाइम और पार्ट-टाइम शिक्षकों की नियुक्ति की जा सकेगी. फुल-टाइम फैकल्टी के लिए 40 प्रतिशत टेन्योर ट्रैक फैकल्टी, 10 प्रतिशत प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस और 50 प्रतिशत एडजंक्ट फैकल्टी का प्रावधान किया गया है.

 

टेन्योर ट्रैक फैकल्टी की प्रारंभिक नियुक्ति पांच वर्ष के लिए होगी. वहीं, पाठ्यक्रम की जरूरत और प्रदर्शन के आधार पर आगे की व्यवस्था तय की जाएगी.

 

हालांकि, सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों में शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति अथवा अनुबंध में राज्य सरकार की आरक्षण नीति लागू नहीं होगी. अनुबंध की अवधि समाप्त होने के बाद संबंधित कर्मचारी आगे नियुक्ति का दावा नहीं कर सकेंगे.

 

किसी भी सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रम को अधिकतम पांच वर्ष की अवधि के लिए मंजूरी दी जाएगी. इसके बाद पाठ्यक्रम को जारी रखने के लिए दोबारा अनुमति लेनी होगी. इस दौरान पाठ्यक्रम की गुणवत्ता, विद्यार्थियों की संख्या, आर्थिक स्थिति और उसकी उपयोगिता का मूल्यांकन किया जाएगा.

 

इसके लिए विश्वविद्यालय स्तर पर नीड असेसमेंट एंड मॉनिटरिंग कमिटी गठित की जाएगी. प्रत्येक पाठ्यक्रम के संचालन और निगरानी के लिए सेंटर स्टीयरिंग कमिटी भी बनाई जाएगी.

 

नए नियमों में सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों की निरंतरता को विद्यार्थियों की संख्या और आर्थिक व्यवहार्यता से भी जोड़ा गया है. यदि किसी पाठ्यक्रम में लगातार तीन वर्षों तक नामांकन कम रहता है, वह लगातार आर्थिक घाटे में चलता है या बाजार और रोजगार की बदलती जरूरतों के अनुरूप अप्रासंगिक हो जाता है, तो उसे बंद किया जा सकेगा. इससे विश्वविद्यालयों को ऐसे पाठ्यक्रम संचालित करने पर जोर देना होगा जिनकी विद्यार्थियों और रोजगार बाजार में वास्तविक मांग हो.

 

सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों में शिक्षकों एवं कर्मचारियों के वेतन, प्रशासनिक खर्च, उपकरण, प्रयोगशाला, अन्य शैक्षणिक संसाधनों और संचालन से जुड़े खर्च की जिम्मेदारी संबंधित पाठ्यक्रम की होगी. इसके लिए विद्यार्थियों से प्राप्त फीस और अन्य गैर-सरकारी स्रोतों का उपयोग किया जाएगा. इस व्यवस्था का उद्देश्य विश्वविद्यालयों पर अतिरिक्त वित्तीय भार डाले बिना मांग आधारित और रोजगारपरक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देना है.

 

पहले से संचालित सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों को नए नियमों के अनुरूप लाने के लिए विश्वविद्यालयों को एक वर्ष का ट्रांजिशन पीरियड दिया गया है. इस अवधि में विश्वविद्यालयों को आवश्यक अनुमोदन, संरचना और अन्य निर्धारित प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी.

 

निर्धारित अवधि में आवश्यक प्रक्रिया पूरी नहीं करने वाले बिना मान्यता वाले सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रम रद्द माने जाएंगे. ऐसे पाठ्यक्रमों के आधार पर विद्यार्थियों को डिग्री जारी नहीं की जा सकेगी.

 

नए नियमों के तहत सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों को केवल फीस आधारित पाठ्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, उपयोगिता और रोजगार की संभावनाओं के आधार पर संचालित करने की व्यवस्था की गई है. पांच वर्ष की समीक्षा और लगातार कम नामांकन वाले पाठ्यक्रमों को बंद करने के प्रावधान से विश्वविद्यालयों को समय-समय पर अपने पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता का आकलन करना होगा.


मुख्य बिंदु

सेल्फ-फाइनेंस्ड कोर्स के लिए राज्य सरकार कोई आवर्ती या अनावर्ती वित्तीय सहायता नहीं देगी.

 

शिक्षकों के वेतन, प्रशासनिक खर्च, उपकरण और अन्य संसाधनों का खर्च विद्यार्थियों की फीस व अन्य गैर-सरकारी स्रोतों से पूरा होगा.

 

विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर सेल्फ-फाइनेंस्ड कोर्स के लिए अलग-अलग सेंटर स्थापित किए जाएंगे.

 

चार वर्षीय UG, एक-दो वर्षीय PG, सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स संचालित किए जा सकेंगे.

 

नियमित छात्रों के लिए भी कोर्स: इलेक्टिव, स्पेशलाइजेशन और रिसर्च कोर्स चलाए जा सकेंगे.

 

नामांकन चांसलर पोर्टल या निर्धारित कॉमन एडमिशन पोर्टल से होगा और झारखंड की आरक्षण नीति लागू होगी.

 

पात्र सेल्फ-फाइनेंस्ड कोर्स के विद्यार्थियों को नियमित छात्रों की तरह कई सुविधाएं मिलेंगी, जिसमें विश्वविद्यालय चुनाव में मतदान का अधिकार भी शामिल है.

 

शिक्षकों की अलग व्यवस्था: फुल-टाइम फैकल्टी में 40% टेन्योर ट्रैक, 10% प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस और 50% एडजंक्ट फैकल्टी का प्रावधान.

 

टेन्योर ट्रैक फैकल्टी की प्रारंभिक नियुक्ति पांच वर्ष के लिए होगी.

 

शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति/अनुबंध में राज्य की आरक्षण नीति लागू नहीं होगी.

 

किसी कोर्स को अधिकतम पांच वर्ष के लिए अनुमति मिलेगी, इसके बाद पुनः मंजूरी जरूरी होगी.

 

लगातार तीन वर्षों तक कम नामांकन रहने पर कोर्स बंद किया जा सकता है.

 

घाटे में चलने वाला कोर्स भी बंद होगा: आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं रहने या बाजार की जरूरत के अनुरूप अप्रासंगिक होने पर पाठ्यक्रम बंद किया जा सकेगा.

 

निगरानी कमेटी बनेगी: नीड असेसमेंट एंड मॉनिटरिंग कमिटी और सेंटर स्टीयरिंग कमिटी के जरिए पाठ्यक्रमों की निगरानी होगी.

 

पुराने कोर्स को एक साल की मोहलत: मौजूदा सेल्फ-फाइनेंस्ड कोर्स को नए नियमों के अनुरूप लाने के लिए एक वर्ष का ट्रांजिशन पीरियड दिया गया है.

 

बिना मान्यता डिग्री नहीं: निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं करने वाले बिना मान्यता वाले कोर्स रद्द माने जाएंगे और उनके आधार पर विद्यार्थियों को डिग्री जारी नहीं की जा सकेगी.

 

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