New Delhi : केरल के सबरीमाला मंदिर मामले में आज दूसरे दिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस अहम मामले की सुनवाई 9 जजों की संवैधानिक कर रही है. कल मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना ने एक अहम टिप्पणी की थी. कहा था कि किसी भी महिला के साथ महीने में 3 दिन तक (menstruation के आधार पर) अछूत जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता.
जस्टिस नागरत्ना की यह टिप्पणी तब की, जब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के सबरीमाला फैसले की उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया था कि 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अछूत प्रथा के बराबर है.
आज बुधवार को एसजी तुषार मेहता ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष अदालतें यह तय नहीं कर सकतीं कि अनिवार्य धार्मिक प्रथा क्या है. अदालतें धार्मिक विद्वान नहीं हैं. दलील दी कि सच्ची धर्मनिरपेक्षता वह होगी, जहां राज्य धर्म में हस्तक्षेप न करे और धर्म राज्य में दखल न दे. इसके बाद बेंच ने इस दलील पर सवाल उठाते हुए नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों की बदलती परिभाषाओं पर मंथन किया.
हालांकि आज शुरुआत में याचिकाकर्ताओं के वकील राजीव धवन और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच समय आवंटन को लेकर नोकझोंक हुई. धवन ने तुषार मेहता की लंबी दलीलों पर आपत्ति जताई. राजीव धवन ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर सारा समय एसजी ही ले लेंगे तो फिर याचिकाकर्ताओं को अपनी बात रखने के लिए उचित समय नहीं मिल पायेगा.
इस पर बेंच ने सभी सीनियर वकीलों को पर्याप्त समय देने का आश्वासन दिया. इस क्रम में CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अप्रैल में सुनवाई रखने का कारण यह है कि गर्मियों की छुट्टियों के दौरान बेंच के पास सभी डॉक्यूमेंट्स को पढ़ने का समय रहे. इसके बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील रखते कहा कि अदालतों को आस्था के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
उन्होंने विभिन्न राज्यों के धार्मिक बंदोबस्त अधिनियमों (Religious Endowments Acts) का हवाला देते हुए कहा कि पुजारियों की नियुक्ति की शक्ति राज्य को देना सिद्धांतों का उल्लंघन है. एसजी ने कहा कि धार्मिक संप्रदायों को परिभाषित करना अपरिभाषित को परिभाषित करने जैसा होगा. उन्होंने शिरडी साईं बाबा और तिरुपति का उदाहरण दिया.कहा कि जहां हर वर्ग के लोग आते हैं, वहां संप्रदाय की सख्त परिभाषा लागू करना संभव नहीं हो सकता.
एसजी की दलील पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक नैतिकता' स्थिर नहीं है . कहा कि जो 1950 के दशक में अनैतिक या अश्लील माना जाता था, वह आज वैसा नहीं है. उन्होंने पूछा कि क्या हम 50 के दशक के मानकों को संकीर्ण मानसिकता कह सकते हैं? जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि समाज के साथ नैतिकता बदलती रहती हैय इसे महज एक पुराने नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए.
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एसजी के संवैधानिक नैतिकता न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हो सकती...वाले तर्क को खारिज कर दिया. उन्होंने अनुच्छेद 25 का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें अंतरात्मा की स्वतंत्रता शब्द का इस्तेमाल किया गया है. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि यदि नागरिकों का एक वर्ग संवैधानिक नैतिकता से शासित होना चाहता है तो उसे अनुमति क्यों नहीं मिलनी चाहिए, भले ही वह समाज के दूसरे वर्गों की अंतरात्मा को प्रभावित न कर पाये.
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