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सबरीमाला मंदिर केस, किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, जज यह तय नहीं कर सकते : त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने कहा है कि किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, यह उसी समुदाय की आस्था कआधार पर तय होगा. जज खुद यह तय नहीं कर सकते कि धर्म के लिए क्या सही है, क्या गलत.
 

New Delhi : केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने कहा है कि किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, यह उसी समुदाय की आस्था के आधार पर तय होगा.

 

जज खुद यह तय नहीं कर सकते कि धर्म के लिए क्या सही है, क्या गलत. त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह दलील आज एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने रखी.

 

उन्होंने कहा कि धर्म एक समूह या समुदाय की आस्था से जुड़ा है. इसलिए कुछ लोगों (महिलाओं के प्रवेश) के अधिकार को पूरे समुदाय के अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता. अदालत धार्मिक विश्वास के मामले में फैसला नहीं सुना सकती. यह विश्वास का मामला है, न कि तार्किकता का.

 

याद करें कि इससे पूर्व सात, आठ और नौ अप्रैल तीन दिन की सुनवाई के दौरान महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखी गयी. केंद्र सरकार के अनुसार देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश पर प्रतिबंध है, इसलिए सभी को धार्मिक परंपराओं का सम्मान करना चाहिए.

 

मामला यह है कि केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला  मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया था. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण करार देते हुए प्रतिबंध हटा दिया था.

 

इसके बाद दायर की गयी पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न तय किये गये, जिस पर बहस जारी है.

 

   

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