Saraikela News: ग्राम पदमपुर में मंगलवार को प्रकृति पर्व करम पूजा पूरे श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया. पूजा को लेकर सुबह से ही गांव में उत्सव का माहौल रहा. बहनों ने भाई-बहन के अटूट प्रेम, सुख-समृद्धि और भाइयों की दीर्घायु की कामना को लेकर कठोर उपवास रखा.
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देर शाम विधि-विधान के साथ करम डाली को पूजा स्थल पर जावा के साथ स्थापित किया गया. जावा की टोकरियों को फूल, सिंदूर और रंग-बिरंगे धागों से आकर्षक ढंग से सजाया गया. करम डाली की स्थापना के बाद पूजा-अर्चना शुरू हुई और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक विधि से करम राजा की आराधना की.
पूजा के मुख्य पुजारी सुधीर सरदार ने उपस्थित श्रद्धालुओं को करम पूजा से जुड़ी पारंपरिक कारमू और धरमू दो भाइयों की कथा सुनाई. उन्होंने कहा कि करम वृक्ष को शक्ति, युवावस्था, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है. उन्होंने श्रद्धालुओं को करम पूजा की परंपरा और इसके पीछे छिपे सांस्कृतिक संदेश से भी अवगत कराया.
इस अवसर पर एमपी सिंह सरदार ने कहा कि करम पूजा और जावा की परंपरा तीन दिनों तक भाई-बहन के प्रेम, आस्था और उपवास के साथ निभाई जाती है. उन्होंने कहा कि करम केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और भाई-बहन के अटूट रिश्ते का उत्सव है.
करम पूजा के अवसर पर पारंपरिक गीत-संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए. मांदर और नगाड़े की थाप पर महिलाओं ने पारंपरिक करम नृत्य किया. गीत और नृत्य से पूरा गांव करम पर्व की उमंग और भक्ति में सराबोर नजर आया.
पूजा में गांव के बुजुर्गों के साथ बड़ी संख्या में युवा, महिलाएं और श्रद्धालु शामिल हुए. पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, नृत्य और पूजा की विधियों ने पदमपुर के वातावरण को पूरी तरह करममय बना दिया. आस्था और परंपरा के इस संगम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि प्रकृति से जुड़ी लोक संस्कृति आज भी गांवों की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से जीवित रखे हुए है.
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