Ranchi: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान जल संसाधन और विधि व्यवस्था विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा करते हुए विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने राज्य सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि राज्य की करीब 70 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है, लेकिन जल संसाधन विभाग को बजट केवल 1 से 1.5 प्रतिशत ही आवंटित किया जाता है. उन्होंने कहा कि मौजूदा रफ्तार से झारखंड की पूरी कृषि योग्य भूमि तक पानी पहुंचाने में लगभग 129 साल लग जाएंगे.
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तिवारी ने कहा कि विभाग के पास बजट खर्च करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं. उन्होंने बताया कि वर्ष 2025-26 में जल संसाधन विभाग के लिए आवंटित 2257 करोड़ रुपये में से केवल 72 प्रतिशत राशि ही खर्च हो सकी. उन्होंने कहा कि राज्य के कई विभागों में औसतन 45 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन में दिक्कत हो रही है.
उन्होंने कई अधूरी सिंचाई परियोजनाओं का भी मुद्दा उठाया. स्वर्णरेखा परियोजना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि लगभग 48 साल पहले शुरू हुई इस योजना की लागत कई गुना बढ़ चुकी है, फिर भी यह पूरी नहीं हो सकी है. इसी तरह कोणार परियोजना की लागत भी कई गुना बढ़ गई है. उन्होंने मेराल प्रखंड के पलाही डैम का भी जिक्र करते हुए कहा कि इस बांध का करीब 90 प्रतिशत काम वर्षों पहले पूरा हो चुका था, लेकिन इसके बाद भी इसे पूरा नहीं किया गया.
विस्थापन के मुद्दे पर तिवारी ने कहा कि मंडल डैम बनने के बाद करीब 7000 विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए सरकार के पास अब तक कोई ठोस नीति नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि बिना पर्याप्त तैयारी के लोगों को दूसरी जगह बसाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे कई गांव प्रभावित हो सकते हैं.
चर्चा के दौरान उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था और न्यायपालिका में कर्मचारियों की कमी का मुद्दा भी उठाया. अपने ऊपर लगे अलकतरा घोटाले के आरोपों पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की डबल बेंच ने उनपर लगे आरोपों को खारिज कर दिया था. उन्होंने मांग की कि राजनीतिक लोगों से जुड़े मामलों में स्पीडी ट्रायल चलाया जाए ताकि सच्चाई सामने आ सके.
विधायक ने सरकार के बजट को दिखावे का बजट बताते हुए कहा कि यह केवल कागजों तक सीमित है. उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों, सिंचाई योजनाओं और विस्थापितों के मुद्दों पर गंभीरता से काम करना चाहिए.
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