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खेती के समय पशुओं पर आती है शामत
खेतों में धान के पौधे निकल आने पर पशुओं को चारागाह नहीं मिलती. चरवाहे सड़कों पर पशुओं को लेकर घास की खोज में टहलाने लगते हैं. यह संकट पशुधन पर जून-जुलाई से अक्टूबर-नवंबर तक रहती है. हालांकि, सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था के अभाव में इस क्षेत्र में एक ही फसल उत्पादन होती है. अन्यथा वर्ष भर पशुओं पर यह संकट बनी रहती. इसे भी पढ़ें : किरीबुरु">https://lagatar.in/kiriburu-first-meeting-of-jharkhand-group-of-mines-held-at-ispat-bhawan-bokaro/">किरीबुरु: बोकारो के इस्पात भवन में झारखंड ग्रुप ऑफ माइंस की पहली बैठक आयोजित
क्या कहते हैं ग्रामीण पशुपालक किसान
गांव के उम्रदराज पशुपालक किसानों की सुने तो पहले हर गांव में पशुओं के चरने के लिए पर्याप्त मैदान होती थी. सरकारी खास व गोचर के नाम भी कुछ भूखंड हुआ करते थे. अब ऐसे भूखंड सरकारी आंकड़ों में हैं या कुछ नियम बदल दिए गए हमलोग यह बात नहीं जानते. हमें सिर्फ इतना ही पता है कि खेती के समय जिन मैदानों में हमलोग पशु चराया करते थे, अब वे मैदान गायब होने लगे हैं. ऐसे में यह भी बताया जा रहा है कि अब ग्रामीण क्षेत्र में पशुधन भी कम होते जा रहे हैं. इसे भी पढ़ें : सरायकेला">https://lagatar.in/seraikela-darshan-of-lord-varaha-nrasimha-incarnation-at-gundicha-temple/">सरायकेला: गुंडिचा मंदिर में प्रभु के वराह-नृसिंह अवतार के हुए दर्शन [wpse_comments_template]

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