Ranchi : झारखंड तकनीकी विश्वविद्यालय (JUT) के कुलपति डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह की शैक्षणिक योग्यता, सेवा नियमों के पालन और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं.इस संबंध में 20 जुलाई 2026 को राजभवन, मुख्यमंत्री सचिवालय, उच्च व तकनीकी शिक्षा मंत्री सहित कई उच्च अधिकारियों को ई-मेल के माध्यम से एक विस्तृत शिकायत भेजकर स्वतंत्र व उच्च स्तरीय जांच की मांग की है. शिकायत की प्रतिलिपि सीबीआई (CBI), एआईसीटीई (AICTE) और कुलाधिपति कार्यालय को भी भेजी गई है.
पूर्णकालिक नौकरी के दौरान पीएचडी करने पर सवाल
शिकायत में डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह के उपलब्ध बायोडाटा और अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा गया है कि वे 25 मार्च 1992 से 24 मार्च 2002 तक बीआईटी सिंदरी में सहायक प्राध्यापक तथा इसके बाद एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में पूर्णकालिक सेवा में कार्यरत रहे.

आरोप है कि इसी दौरान उन्होंने वर्ष 2005 में विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग (BIT सिंदरी अध्ययन केंद्र) से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की.शिकायतकर्ता ने मांग की है कि यह जांच की जाए कि क्या उन्होंने पूर्णकालिक पीएचडी कार्यक्रम में प्रवेश लेने से पहले विभागीय अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC), सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति अथवा विधिवत स्वीकृत अध्ययन अवकाश (Study Leave) लिया था या नहीं. शिकायत के अनुसार यदि ऐसा नहीं किया गया, तो यह सेवा नियमों और प्रशासनिक प्रावधानों के उल्लंघन का मामला हो सकता है.
प्रीति राज मामले में हितों के टकराव का आरोप
शिकायत में प्रीति राज के मामले का भी उल्लेख किया गया है. आरोप है कि उन्होंने भी पूर्णकालिक सेवा के दौरान नियमित एम.टेक. पाठ्यक्रम में अध्ययन किया तथा सरकारी छात्रवृत्ति सहित अन्य शैक्षणिक लाभ प्राप्त किए.
शिकायतकर्ता का आरोप है कि चूंकि कुलपति डॉ. सिंह का स्वयं का शैक्षणिक रिकॉर्ड भी इसी प्रकार की परिस्थितियों से जुड़ा प्रतीत होता है, इसलिए उन्होंने हितों के टकराव (Conflict of Interest) के कारण प्रीति राज के मामले में निष्पक्ष एवं विधिसम्मत कार्रवाई नहीं की.
आंतरिक जांच पर भी उठाए सवाल
शिकायत में विश्वविद्यालय की आंतरिक जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. आरोप लगाया गया है कि झारखंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के करिकुलम डायरेक्टर को दो बार जांच समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिसकी परिस्थितियों और औचित्य की भी जांच होनी चाहिए.
शिकायतकर्ता का कहना है कि जांच अधिकारियों ने महत्वपूर्ण तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों की अनदेखी की तथा गंभीर आरोपों को सामान्य विवाद के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया. साथ ही यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि जांच समिति का गठन निष्पक्ष कार्रवाई से बचने और किसी व्यक्ति विशेष को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया.
5 कानूनी कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र एवं उच्च स्तरीय जांच कराई जाए. साथ ही यदि जांच में यह साबित होता है कि जांच समिति का गठन या उसके निष्कर्ष किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार किए गए थे, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए.
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