Ranchi : केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड (सीयूजे) के मानवशास्त्र एवं जनजातीय अध्ययन विभाग (डीएटीएस) द्वारा “भाषा और मौन” तथा “प्रश्न और अंतर्दृष्टि: भारतीय दर्शन के आयाम” विषय पर दो विशिष्ट विशेष व्याख्यानों का आयोजन किया गया.
इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन (पश्चिम बंगाल) के कंसल्टिंग प्रोफेसर प्रो. रंजीत कुमार देव गोस्वामी थे.
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्कृति अध्ययन संकाय के अधिष्ठाता एवं मानवशास्त्र एवं जनजातीय अध्ययन विभागाध्यक्ष प्रो. रवीन्द्रनाथ शर्मा ने की. इस अवसर पर विभाग की प्राध्यापिका प्रो. सुचेता सेन चौधुरी, डॉ. रजनीकांत पांडेय और डॉ. एम. रामकृष्णन सहित अन्य संकाय सदस्य उपस्थित रहे.
यह व्याख्यान श्रृंखला भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के फील्ड स्टेशन, सेंटर फॉर एंडेंजर्ड लैंग्वेजेज, सेंटर ऑफ इंडिजिनस नॉलेज एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट, इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेल तथा राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी), सीयूजे, रांची के सहयोग से आयोजित की गई.
“भाषा और मौन” विषय पर अपने व्याख्यान में प्रो. गोस्वामी ने बताया कि भाषा ज्ञान का माध्यम होने के साथ-साथ अंतिम सत्य की अभिव्यक्ति में सीमित भी है.
उन्होंने ज्योतिरिंद्रनाथ ठाकुर, जो रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई एवं मार्गदर्शक थे, तथा उनके झारखंड से संबंध का उल्लेख करते हुए भाषा और मौन के द्वैत को दोनों भाइयों के व्यक्तित्व के माध्यम से स्पष्ट किया—एक जो अपने शब्दों के लिए प्रसिद्ध हैं और दूसरे जो मौन के लिए जाने जाते हैं.
उन्होंने जॉर्ज स्टाइनर की पुस्तक ‘Language and Silence’ तथा लुडविग विट्गेंस्टाइन के प्रसिद्ध कथन—“जिसके बारे में कहा नहीं जा सकता, उसके बारे में मौन रहना चाहिए”—का संदर्भ भी दिया. प्रो. गोस्वामी ने नागार्जुन के ‘चतुष्कोटी’ (टेट्रालेम्मा) सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए उन्हें ‘द्वितीय बुद्ध’ के रूप में उल्लेखित किया. साथ ही, फर्डिनेंड डी सॉस्यूर, जाक देरिदा और सिग्मंड फ्रायड जैसे प्रमुख चिंतकों के योगदान की भी चर्चा की.
उन्होंने ऋग्वेद और विभिन्न उपनिषदों में भाषा और मौन की महत्ता को रेखांकित करते हुए बताया कि ये ग्रंथ जीवन के विविध आयामों से जुड़े प्रश्नों से परिपूर्ण हैं. उन्होंने कहा कि मौन इस बात की स्वीकृति है कि भाषा संपूर्ण सत्य को व्यक्त करने में असमर्थ है, क्योंकि सत्य ‘अनेकांत’ है.
इस व्याख्यान श्रृंखला का उद्देश्य विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के बीच भारतीय दार्शनिक परंपरा के प्रति गहन चिंतन, बौद्धिक संवाद और सराहना को प्रोत्साहित करना था.
विश्वविद्यालय प्रशासन, विशेषकर कुलपति प्रो. सारंग मेधेकर ने विभाग द्वारा आयोजित इस विशेष व्याख्यान की सराहना करते हुए इसे शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पहल बताया.
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