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हाल-ए-झारखंड पुलिस: भगवान भरोसे फोरेंसिक जांच, बड़े कांड पर रांची से बुलानी पड़ती है टीम

Ranchi News : झारखंड पुलिस अपराधियों पर शिकंजा कसने और जांच को वैज्ञानिक बनाने का दावा करती है, लेकिन फोरेंसिक व्यवस्था की जमीनी तस्वीर कई सवाल खड़े करती है. झारखंड सरकार के आंकड़ों के अनुसार राज्य के सभी जिलों में फोरेंसिक मोबाइल वैन उपलब्ध नहीं हैं. फोरेंसिक और साइबर फोरेंसिक विशेषज्ञों के लिए पर्याप्त पद सृजित नहीं किए गए हैं.
 
प्रतीकात्मक चित्र

Ranchi News : झारखंड पुलिस अपराधियों पर शिकंजा कसने और जांच को वैज्ञानिक बनाने का दावा करती है, लेकिन फोरेंसिक व्यवस्था की जमीनी तस्वीर कई सवाल खड़े करती है. झारखंड सरकार के आंकड़ों के अनुसार राज्य के सभी जिलों में फोरेंसिक मोबाइल वैन उपलब्ध नहीं हैं. फोरेंसिक और साइबर फोरेंसिक विशेषज्ञों के लिए पर्याप्त पद सृजित नहीं किए गए हैं.

 

क्राइम सीन अफसरों की भर्ती भी पूरी नहीं हुई है. ऐसे में किसी जिले में हत्या, गोलीकांड या कोई बड़ी आपराधिक घटना होने पर वैज्ञानिक जांच के लिए स्थानीय स्तर पर तत्काल व्यवस्था नहीं होने की स्थिति में दूसरे स्थान से फोरेंसिक टीम बुलानी पड़ती है.

 

बड़े कांड में रांची की ओर देखता है जिला

झारखंड में कई बड़ी आपराधिक घटनाओं में घटनास्थल की वैज्ञानिक जांच के लिए एफएसएल टीम को बुलाया जाता रहा है. कई मामलों में रांची से विशेषज्ञ टीम घटनास्थल पर पहुंचकर खून के नमूने, फिंगरप्रिंट, हथियार, कारतूस, कपड़े और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाती है. इससे साफ है कि फोरेंसिक जांच आपराधिक मामलों में कितनी महत्वपूर्ण हो चुकी है. लेकिन सवाल यह है कि जब हर जिले में ऐसी सुविधा तत्काल उपलब्ध नहीं है तो गंभीर अपराध के बाद वैज्ञानिक जांच कितनी तेजी से शुरू हो पाती है.

 

अपराध के बाद शुरुआती समय घटनास्थल की जांच के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. इसी दौरान वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने होते हैं. यदि विशेषज्ञ टीम को दूसरे जिले या रांची से बुलाना पड़े तो घटनास्थल को सुरक्षित रखना और साक्ष्यों को उसी स्थिति में बनाए रखना पुलिस के लिए चुनौती बन सकता है.

 

BNSS की धारा 176(3) में है स्पष्ट प्रावधान

नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 176(3) गंभीर अपराधों की जांच में फोरेंसिक को महत्वपूर्ण भूमिका देती है. इसमें सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में घटनास्थल पर फोरेंसिक विशेषज्ञ को भेजकर वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने का प्रावधान है. साथ ही साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया की मोबाइल फोन या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से वीडियोग्राफी कराने की बात कही गई है.

 

कानून की मंशा साफ है कि गंभीर अपराधों की जांच केवल पुलिस की पारंपरिक जांच तक सीमित न रहे, बल्कि घटनास्थल से वैज्ञानिक साक्ष्यों को भी जांच का अहम हिस्सा बनाया जाए. ऐसे में सवाल यह है कि जब राज्य के सभी जिलों में फोरेंसिक मोबाइल वैन और पर्याप्त विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं तो इस प्रावधान को जमीन पर पूरी तरह लागू करने की व्यवस्था कितनी मजबूत है.

 

केंद्र ने 24 जिलों के लिए मांगी फोरेंसिक व्यवस्था

फोरेंसिक व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार की ओर से भी झारखंड को गंभीरता से काम करने की जरूरत बताई गई है. हाल के दिनों में केंद्र सरकार ने झारखंड के मुख्य सचिव को पत्र भेजकर राज्य के सभी 24 जिलों में फोरेंसिक मोबाइल वैन उपलब्ध कराने और विशेषज्ञों की टीम की तैनाती सुनिश्चित करने को कहा है.

 

इसके साथ ही गंभीर अपराधों के घटनास्थल पर फोरेंसिक विशेषज्ञों की समय पर मौजूदगी और वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाने की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया है.

 

केंद्र की ओर से दिया गया यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BNSS की धारा 176(3) गंभीर अपराधों में फोरेंसिक जांच को जांच प्रक्रिया का अहम हिस्सा बनाती है. ऐसे में सिर्फ राजधानी में विशेषज्ञ टीम और संसाधन होने से काम नहीं चलेगा. जिलास्तर पर भी ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचकर साक्ष्य सुरक्षित कर सके.

 

जिलों में अधिकारी, लेकिन संसाधनों का सवाल

राज्य में संबंधित अधिकारियों की तैनाती की गई है, लेकिन सभी जिलों में फोरेंसिक जांच के लिए जरूरी संसाधन और विशेषज्ञ टीम उपलब्ध नहीं होने की स्थिति सामने आई है. कई बार बड़े हत्या या गंभीर अपराध के मामलों में ही फोरेंसिक टीम की जरूरत पड़ती है. ऐसे मामलों में घटनास्थल से मिले साक्ष्यों को वैज्ञानिक जांच के लिए आगे भेजा जाता है.

 

समीक्षा में यह भी सामने आया कि पुलिस अधीक्षक और पुलिस उपाधीक्षक द्वारा विधि विज्ञान से जुड़े दौरों की निगरानी के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए हैं. क्राइम सीन अफसरों की भर्ती अधूरी है, हालांकि इसके लिए एसओपी का मसौदा तैयार किया जा चुका है.

 

फोरेंसिक लैब में भी लंबित मामलों का दबाव

समस्या केवल घटनास्थल तक सीमित नहीं है. फोरेंसिक प्रयोगशाला में लंबित मामलों और प्रदर्शों की संख्या भी अधिक बताई गई है. यानी घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने के बाद उनकी वैज्ञानिक जांच और रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया पर भी दबाव है.

 

राज्य सरकार मौजूदा एफएसएल के अलावा पांच क्षेत्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएं स्थापित करने की तैयारी कर रही है. हालांकि, इन प्रयोगशालाओं को प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ और तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति भी जरूरी होगी.

 

NFSU से एमओयू तक बाकी

राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय यानी NFSU के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी अभी बाकी हैं. विशेषज्ञों की कमी दूर करने के लिए NFSU से डिग्री प्राप्त उम्मीदवारों और FACT पास अभ्यर्थियों को साक्षात्कार या वॉक-इन के जरिए नियुक्ति देने पर विचार करने का सुझाव दिया गया है.

 

राज्य से भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने और जरूरत के अनुसार अनुबंध के आधार पर विशेषज्ञों की नियुक्ति करने को कहा गया है. लंबित प्रदर्शों के निपटारे के लिए अतिरिक्त जनशक्ति जुटाने और निदेशक डीएफएसएस के साथ समन्वय करने का भी सुझाव दिया गया है.

 

बड़े मामलों में एफएसएल की भूमिका, लेकिन निर्भरता रांची पर

झारखंड के कई चर्चित आपराधिक मामलों में एफएसएल की टीमों को घटनास्थल पर भेजा गया है. इन मामलों से यह स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक जांच किसी अपराध की गुत्थी सुलझाने में कितनी अहम भूमिका निभा सकती है.

 

2026 का सुजीत सिन्हा एनकाउंटर बना ताजा उदाहरण

2026 में कुख्यात गैंगस्टर सुजीत सिन्हा के जामताड़ा में एनकाउंटर के बाद भी फोरेंसिक जांच की जरूरत पड़ी. पुलिस के साथ मुठभेड़ में सुजीत सिन्हा की मौत के बाद घटनास्थल पर एफएसएल टीम पहुंची और वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए गए. मामले में मजिस्ट्रेट जांच की प्रक्रिया भी शुरू हुई.

 

एनकाउंटर जैसे संवेदनशील मामलों में फोरेंसिक जांच की भूमिका और बढ़ जाती है. घटनास्थल पर कितने राउंड फायर हुए, गोली किस दिशा से चली, हथियार किस स्थिति में मिले, फायरिंग के निशान क्या हैं और घटनास्थल से मिले अन्य साक्ष्य घटनाक्रम से मेल खाते हैं या नहीं, ऐसे सवालों के जवाब वैज्ञानिक जांच से हासिल किए जा सकते हैं.

 

साहिबगंज से गिरिडीह तक रांची की टीम पर निर्भरता

मई 2025 में साहिबगंज में सिपाही सुरजित यादव हत्याकांड की जांच के दौरान रांची से एफएसएल टीम पहुंची थी और घटनास्थल से वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए गए थे.

 

जून 2025 में गिरिडीह के दोहरे हत्याकांड में भी रांची से एफएसएल टीम पहुंची थी. टीम ने घटनास्थल का वैज्ञानिक तरीके से निरीक्षण कर साक्ष्य एकत्र किए थे.

 

धनबाद के चर्चित अमन सिंह हत्याकांड में भी फोरेंसिक जांच ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. एफएसएल रिपोर्ट में जब्त पिस्टल, गोलियों और कपड़ों पर मिले रक्त के नमूनों की जांच की गई थी. जांच में कपड़ों पर मिले ब्लड सैंपल के डीएनए प्रोफाइल के मिलान की बात सामने आई थी.

 

इन मामलों से एक बात स्पष्ट है कि जब फोरेंसिक टीम और वैज्ञानिक संसाधन उपलब्ध होते हैं तो जांच को महत्वपूर्ण दिशा मिल सकती है. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या ऐसी सुविधा राज्य के हर जिले में घटना के तुरंत बाद उपलब्ध है.

 

नीरज सिंह हत्याकांड में भी सामने आई एफएसएल की अहमियत

धनबाद के पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह समेत चार लोगों की हत्या के मामले में भी रांची एसएफएसएल के वैज्ञानिक की गवाही अदालत में हुई. फोरेंसिक विशेषज्ञ की गवाही ने यह दिखाया कि किसी बड़े आपराधिक मामले में घटनास्थल से जुटाए गए वैज्ञानिक साक्ष्य लंबे समय तक जांच और न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहते हैं.

 

हाल के मामलों में भी एफएसएल रिपोर्ट की अहमियत सामने आती रही है. हजारीबाग के विष्णुगढ़ में 12 वर्षीय बच्ची की हत्या के मामले में राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट के समक्ष एफएसएल और मृत्यु समीक्षा रिपोर्ट पेश की गई थी. रिपोर्ट में मृत बच्ची के कपड़े, घटनास्थल और आरोपियों से जुड़े साक्ष्यों की जांच का उल्लेख था.

 

पांच क्षेत्रीय लैब से कम होगी रांची पर निर्भरता?

राज्य सरकार पांच क्षेत्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएं स्थापित करने की तैयारी कर रही है. यदि इन प्रयोगशालाओं को पर्याप्त विशेषज्ञ, आधुनिक उपकरण और तकनीकी कर्मचारियों के साथ शुरू किया जाता है तो जिलों की रांची पर निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है.

 

लेकिन केवल प्रयोगशाला बना देना पर्याप्त नहीं होगा. घटनास्थल पर तत्काल पहुंचने वाली मोबाइल फोरेंसिक यूनिट, प्रशिक्षित क्राइम सीन अफसर और पर्याप्त संख्या में विशेषज्ञ भी जरूरी होंगे.

 

सवाल व्यवस्था पर, कानून पर नहीं

सबसे बड़ा सवाल है कि जब BNSS की धारा 176(3) के तहत सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में घटनास्थल पर फोरेंसिक विशेषज्ञ से वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने का प्रावधान है और इस पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी कराई जानी है, तो क्या झारखंड के सभी जिलों में उसके अनुरूप व्यवस्था तैयार है.

 

केंद्र सरकार की ओर से 24 जिलों में फोरेंसिक मोबाइल वैन और विशेषज्ञ टीम उपलब्ध कराने पर जोर दिए जाने के बाद अब राज्य पुलिस के सामने इसे जमीन पर उतारने की चुनौती है. अगर किसी जिले में बड़ी हत्या, गोलीकांड या कोई अन्य गंभीर अपराध होने के बाद वैज्ञानिक जांच के लिए रांची से टीम बुलानी पड़े, तो घटनास्थल के शुरुआती महत्वपूर्ण समय में वैज्ञानिक जांच कैसे सुनिश्चित होगी.

 

पांच क्षेत्रीय एफएसएल की स्थापना निश्चित तौर पर सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके साथ जिलास्तर पर मोबाइल फोरेंसिक यूनिट, क्राइम सीन अफसर और विशेषज्ञों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी.

 

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