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सदन में राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2026 पर हुई लंबी बहस, शिक्षा सुधार के मुद्दों पर चर्चा

Ranchi: झारखंड विधानसभा में उच्च शिक्षा व्यवस्था को लेकर झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2026 पर विस्तृत चर्चा हुई. इससे पहले वर्ष 2025 में पारित विधेयक को वापस लेकर संशोधित रूप में नया विधेयक सदन में प्रस्तुत किया गया, जिस पर पक्ष और विपक्ष के बीच लंबी बहस देखने को मिली.

 

मंत्री सुदिव्य कुमार ने सदन को जानकारी देते हुए बताया कि 26 अगस्त 2025 को पारित विधेयक को राज्यपाल की सहमति के लिए भेजा गया था. लेकिन विभागीय स्तर पर किए गए सेल्फ असेसमेंट में कुछ प्रावधानों में सुधार की आवश्यकता सामने आई. इसके बाद नियम 110 के तहत पुराने विधेयक को वापस लेकर वर्ष 2026 का नया विधेयक लाया गया. उन्होंने कहा कि नए विधेयक में लिपिकीय त्रुटियों को सुधारा गया है और कई महत्वपूर्ण परिभाषाओं को स्पष्ट किया गया है.

 

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विधेयक की प्रस्तावना में गैर-कृषि और गैर-चिकित्सा विश्वविद्यालयों के प्रभावी विनियमन और सामाजिक और शैक्षणिक भागीदारी को स्पष्ट किया गया है. कंडिका 2 के तहत कई शब्दों की नई परिभाषाएं जोड़ी गई हैं. इसमें निकाय को पदाधिकारियों द्वारा गठित संस्था के रूप में, समिति को विश्वविद्यालय या महाविद्यालय की समिति के रूप में और आयोग को राज्य सरकार द्वारा गठित विश्वविद्यालय सेवा आयोग या अन्य संवैधानिक निकाय के रूप में परिभाषित किया गया है.

 

सामुदायिक महाविद्यालय को अंगीभूत इकाई के रूप में शामिल करते हुए कौशल आधारित शिक्षा, डिग्री और डिप्लोमा कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का प्रावधान किया गया है. इसके साथ ही पदाधिकारी के तहत कुलसचिव, वित्त पदाधिकारी और परीक्षा नियंत्रक जैसे पदों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है. विधेयक में लिंग-निरपेक्ष भाषा का उपयोग करते हुए वह और उसे जैसे शब्दों को सामान्य रूप से लागू किया गया है.

 

 

 

क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है ताकि विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक कार्यों को विकेंद्रीकृत किया जा सके. नियामक निकायों के रूप में UGC, AICTE, NCTE और ICAR का स्पष्ट उल्लेख किया गया है. राज्य सरकार की परिभाषा में झारखंड सरकार और उसके अधिकृत पदाधिकारियों को शामिल किया गया है. साथ ही राज्य की आरक्षण नीति को भी स्पष्ट रूप से लागू करने का प्रावधान किया गया है.

 

कंडिका 8 के तहत यह व्यवस्था की गई है कि यदि कोई विश्वविद्यालय अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करता है तो राज्य सरकार उसे निर्देश दे सकती है और उन निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा. कंडिका 13 में प्रतिकुलपति को हटाने की प्रक्रिया में राज्यपाल और मुख्यमंत्री की संयुक्त भूमिका का प्रावधान रखा गया है.

 

विधेयक पर चर्चा के दौरान विधायक राज सिन्हा ने कहा कि 135 पृष्ठों के इस महत्वपूर्ण विधेयक को पढ़ने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया. उन्होंने कहा कि इतने बड़े दस्तावेज पर गहराई से विचार के लिए अधिक समय मिलना चाहिए था. उन्होंने विश्वविद्यालयों में प्लेसमेंट व्यवस्था को मजबूत करने की मांग करते हुए सुझाव दिया कि बड़ी कंपनियों के कार्यालय परिसर में स्थापित किए जाएं ताकि स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलें और उनका पलायन रुके.

 

राज सिन्हा ने कुलपति और प्रतिकुलपति की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया में राज्यपाल की स्वतंत्र भूमिका सुनिश्चित करने की भी मांग की. उनका कहना था कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बनी रहेगी. उन्होंने सीनेट की बैठकों को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि कई विश्वविद्यालयों में 2017 के बाद से बैठकें नहीं हुई हैं. उन्होंने त्रैमासिक बैठक अनिवार्य करने का सुझाव दिया ताकि वित्तीय और प्रशासनिक पारदर्शिता बनी रहे.

 

विधायक अमित कुमार यादव ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. उन्होंने प्रस्ताव दिया कि कुलपति और प्रतिकुलपति से जुड़े मामलों में केवल राज्यपाल की भूमिका होनी चाहिए और मुख्यमंत्री की भागीदारी नहीं होनी चाहिए.

 

मंत्री सुदिव्य कुमार ने विपक्ष के सभी सवालों का जवाब देते हुए कहा कि विधेयक में पहले से ही प्लेसमेंट और इंटर्नशिप के लिए बोर्ड और औद्योगिक भागीदारी का प्रावधान किया गया है, इसलिए अलग से कंपनियों के कार्यालय स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने कहा कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री की संयुक्त प्रक्रिया पारदर्शिता सुनिश्चित करती है और यह व्यवस्था राज्य हित में है.

 

सीनेट की बैठकों के मुद्दे पर मंत्री ने कहा कि पहले इस संबंध में कोई बाध्यकारी प्रावधान नहीं था, जिसके कारण बैठकें नहीं हो पाती थीं. अब नए विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि वर्ष में कम से कम दो बार, सम और विषम सेमेस्टर में, बैठक करना अनिवार्य होगा.

 

खंडवार चर्चा के दौरान खंड 2 से 4 तक बिना किसी संशोधन के स्वीकृत किए गए. खंड 5 पर राज सिन्हा द्वारा दिया गया प्लेसमेंट सेल से जुड़ा संशोधन स्वीकार नहीं किया गया और मूल प्रावधान पर ही चर्चा आगे बढ़ी. खंड 6 से 12 तक भी बिना बदलाव के चर्चा के बाद आगे बढ़ाया गया.

 

खंड 13 पर राज्यपाल की स्वतंत्र भूमिका से जुड़े संशोधन प्रस्ताव राज सिन्हा और अमित कुमार यादव द्वारा रखे गए, लेकिन इन पर सहमति नहीं बन सकी. इसके बाद खंड 14 से 40 तक के प्रावधानों पर चर्चा हुई. खंड 41 पर सीनेट की बैठक करने और कंपनी प्रतिनिधियों को शामिल करने का सुझाव भी सामने आया, लेकिन इस पर भी सहमति नहीं बनी. इसके बाद खंड 42 से लेकर खंड 93 तक के प्रावधानों पर भी चर्चा हुई और विधेयक के सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया गया.


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