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Suicide Attempt: BHU के IMS में डॉक्टर के आत्महत्या के प्रयास ने खोली पोल, निष्पक्ष जांच की मांग

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में एक जूनियर डॉक्टर के आत्महत्या के प्रयास ने मेडिकल संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. समस्तीपुर की रहने वाली डॉ. सत्या, जो सर्जरी विभाग में जूनियर रेजिडेंट (JR-1) के तौर पर कार्यरत थीं.
 

Varansi: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में एक जूनियर डॉक्टर के आत्महत्या के प्रयास ने मेडिकल संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. समस्तीपुर की रहने वाली डॉ. सत्या, जो सर्जरी विभाग में जूनियर रेजिडेंट (JR-1) के तौर पर कार्यरत थीं.  उन्होंने 13 मार्च को कथित तौर पर अधिक मात्रा में इंसुलिन लेकर आत्महत्या का प्रयास किया. फिलहाल उनकी हालत गंभीर है और वे वेंटिलेटर पर जिंदगी की लड़ाई लड़ रही हैं.

सूत्रों के अनुसार, संस्थान में रेजिडेंट डॉक्टरों से लगातार 36-36 घंटे तक ड्यूटी कराई जा रही है. यह न केवल अमानवीय है बल्कि नियमों के खिलाफ भी है. भारत सरकार की 1992 की रेजीडेंसी योजना के अनुसार किसी भी रेजिडेंट डॉक्टर से सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे और एक बार में 12 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता. 


एम्स ने भी 21 अगस्त 2025 के आदेश में इन नियमों की पुष्टि की है. इसके बावजूद आईएमएस बीएचयू में कथित तौर पर फर्जी ड्यूटी रोस्टर बनाकर नियमों की अनदेखी की जा रही है. अत्यधिक काम और नींद की कमी का असर डॉक्टरों के स्वास्थ्य के साथ-साथ मरीजों के इलाज की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है.

 

इस मामले को लेकर यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट ने मोर्चा खोल दिया है. संगठन के चेयरपर्सन डॉ. लक्ष्य मित्तल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, वाराणसी के जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की मांग की है. यूडीएफ का आरोप है कि बीएचयू प्रशासन ने आंतरिक जांच समिति बनाकर मामले को दबाने की कोशिश की है.

 

संगठन ने मांग की है कि आंतरिक जांच समिति को भंग कर किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से निष्पक्ष जांच कराई जाए. सर्जरी विभाग में खराब कार्य माहौल और शोषण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो. 1992 की रेजीडेंसी योजना के तहत साप्ताहिक 48 घंटे की ड्यूटी व्यवस्था तुरंत लागू की जाए. साथ ही डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उनके ड्यूटी घंटों का डेटा सार्वजनिक किया जाए.

 

राष्ट्रीय स्तर पर भी यह समस्या गंभीर बनी हुई है. नेशनल मेडिकल कमीशन की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार करीब 37 प्रतिशत मेडिकल छात्र आत्महत्या के विचारों से जूझ रहे हैं और हर साल 25 से ज्यादा छात्र आत्मघाती कदम उठाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक डॉक्टरों को पर्याप्त आराम, नींद और बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तब तक बेहतर स्वास्थ्य सेवा की उम्मीद करना मुश्किल है.

 

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