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अबुआ सरकार ने पेसा कानून के बजाय JPRA को ही नया नाम देकर अनुसूचित क्षेत्रों पर थोप दिया: ग्लैडसन

Ranchi : पुरूलिया रोड स्थित एसडीसी सभागार हॉल में आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद के लोगों ने झारखंड कैबिनेट से पारित पेसा नियमावली 2025 को लेकर संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया. 

 

इस दौरान अध्यक्ष ग्लैडसन डुंगडुंग, पारंपरिक ग्रामसभा समन्यवय समिति के संयोजक विनसाय मुंडा, सिंहभूम आदिवासी एकता मंच के कार्यकारी अध्यक्ष सुरेश सोय, महासचिव सुषमा बिरूली, संयोजक वाल्टर कंडुलना मौजूद थे.

 

इस दौरान अध्यक्ष ग्लैडसन डुंगडुंग ने कहा कि अबुआ सरकार ने पेसा कानून 1996 की आत्मा लागू करने के बजाय जेपीआरए 2001 को ही नया नाम देकर अनुसूचित क्षेत्रों पर थोप दिया है, जिससे ग्रामसभा का पारंपरिक स्वशासन कमजोर हो गया है.

 

संविधान के अनुच्छेद 244(1), 243(एम) और 254 के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष कानून लागू होने चाहिए, लेकिन पेसा 2025 में जंगल, परती भूमि और कई प्राकृतिक संसाधनों को सामुदायिक संसाधन से बाहर कर दिया गया है.

 

परिषद के अध्यक्ष ने कहा कि बालू को श्रेणी-1 और 2 में बांटने का प्रयास किया है. भूमि अधिग्रहण जैसी अहम बैठकों का अधिकार ग्रामसभा से छीनकर मुखिया को सौंपने का काम किया गया है.

 

परिषद के लोगों ने कहा कि झारखंड हाईकोर्ट ने 29 जुलाई 2024 को निर्देश दिया था कि राज्य सरकार पेसा कानून 1996 के अनुरूप नियम बनाए, न कि जेपीआरए आधारित.

 

राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कांग्रेस पर भी आरोप लगाए गए है. भाजपा पर आरोप है कि 13 साल के शासन में उसने पेसा लागू नहीं किया और जेपीआरए, लैंड बैंक व औद्योगिक नीतियों से ग्रामसभाओं को कमजोर किया. 

 

वहीं, कांग्रेस पर 2025 में पेसा कानून लाने का वादा कर आदिवासी समाज को धोखा देने का काम किया गया है. अगर पेसा 1996 के सभी 23 प्रावधान लागू नहीं हुए तो झारखंड में जनांदोलन किया जाएगा.

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