- दहाञ करम गसाञ! बहिनेक करम भाइएक धरम!!
Shambhu Kumar
Chakradharpur News : करम परब मूल रूप से प्रकृति, कृषि और सृजन शक्ति पर आधारित महत्वपूर्ण लोकपर्व है. झारखंड, बंगाल, ओडिशा सहित असम के कुछ जिलों में इसे धूमधाम और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है. भादो मास की एकादशी को मनाए जाने वाले इस पर्व की तैयारियां चंद्र पंचांग के अनुसार प्रतिपदा से ही शुरू हो जाती हैं.
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प्रतिपदा के दिन जावा डाली उठाकर पर्व का शुभारंभ किया जाता है. कई स्थानों पर तीज की डाली विसर्जित करने के बाद जावा डाली उठाने की परंपरा है. पश्चिमी सिंहभूम जिला में भी करम पर्व की तैयारियां जगह-जगह की जा रही है. पश्चिमी सिंहभूम जिला के चक्रधरपुर, मनोहरपुर, जगन्नाथपुर, नोवामुंडी, तांतनगर, सोनुवा, गोइलकेरा, आनंदपुर समेत अन्य स्थानों में धूमधाम से की जाती है.
चक्रधरपुर के झामुमो नेता सह समाजसेवी प्रदीप महतो के अनुसार करम पर्व मुख्य रूप से कृषि कर्म से जुड़ा सृजनकारी पर्व है और जनजातीय समाज में इसका विशेष महत्व है. कुड़मी, उरांव और मुंडा सहित विभिन्न समुदाय इसे उत्साह के साथ मनाते हैं. भादो माह के प्रवेश के साथ ही गांव की कुंवारी लड़कियां अखाड़े में करम गीत और नृत्य का अभ्यास शुरू कर देती हैं.
वे अपनी-अपनी करम दहंगी तैयार करती हैं और जावा उठाने के लिए दिन निर्धारित करती हैं. जावा में सामान्यतः नौ या 11 प्रकार के बीज डाले जाते हैं. इनमें कुरथी, मूंग, बिरही, रमहा, राहड़, बाजरा, मक्का, मटर, चना, मेथी और धान प्रमुख हैं. जावा पांच प्रकार का माना जाता है—सांची जावा, मांची जावा, बन जावा, बागाल या गठ जावा और गेराम बसमता जावा. इनमें सांची जावा को मुख्य माना जाता है.
इसमें 11 प्रकार के बीज डालकर 11 दिनों तक जावा उठाया जाता है. इसमें धान और मेथी का होना अनिवार्य माना जाता है. अन्य जावा नौ प्रकार के बीजों से पांच, सात या नौ दिनों तक उठाए जाते हैं. सांची जावा उठाने वाली कुंवारी लड़कियों के लिए विशेष नियम होते हैं. वे सामूहिक रूप से जावा उठाती हैं और अपने हिस्से में खूंटी गाड़ती हैं. परंपरा के अनुसार साग और दही खाने, खटिया पर सोने और कंघी करने से परहेज किया जाता है. नमक हाथ में लेकर खाने और नदी में हाबु देकर स्नान करने से भी बचा जाता है.
चूल्हे पर पकाई वस्तु खाने से परहेज किया जाता है. सांची जावा एक लड़की लगातार तीन वर्षों तक ही उठा सकती है. जावा उठाने के बाद सुबह-शाम करम गीत गाकर उसे जगाया जाता है. करम एकादशी के दिन उपवास रखा जाता है. ओनाया विधि-विधान से करम डाल लाकर अखाड़े में स्थापित करता है. सांची जावा उठाने वाली व्रती करम डाल के चारों ओर चौक पूरती है.
करम गुसाईं का दीप जलाने के बाद सभी करमती अपने-अपने दीप जलाती हैं. रातभर करम गीत, नृत्य और दीप जलाकर अखाड़े को जागृत रखा जाता है. सुबह जावा मेड़ाया जाता है और विशेष गीत गाया जाता है—“जा जाहुँ करम गसाञ, जा छहअ मास रे जा छहअ मास, आउतअ भादरअ मास आनउबअ घुराइ.” इसके बाद जावा और करम डाली का विसर्जन किया जाता है.
कुछ जावा घर लाकर छप्पर, आंगन, खेत और बाड़ी में डाले जाते हैं. इसके बाद बहनें भाइयों की कलाई में जावा बांधकर सुख-शांति, समृद्धि और अच्छी फसल की कामना करती हैं. इसी के साथ करम परब हर्षोल्लास के साथ संपन्न होता है.
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