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चतरा में बेटियों का घटता लिंगानुपात बना गंभीर चेतावनी, भ्रूण जांच और गर्भपात सबसे बड़ी वजह

जिले में बेटियों का लगातार घटता अनुपात समाज और प्रशासन दोनों के लिए गहरी चिंता का विषय बनता जा रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रति 1000 की आबादी पर मात्र 892 लड़कियों का जन्म होना न सिर्फ जनसांख्यिकीय असंतुलन को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक सोच पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है.
 

Chatra: जिले में बेटियों का लगातार घटता अनुपात समाज और प्रशासन दोनों के लिए गहरी चिंता का विषय बनता जा रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रति 1000 की आबादी पर मात्र 892 लड़कियों का जन्म होना न सिर्फ जनसांख्यिकीय असंतुलन को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक सोच पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारों के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि आज भी बेटा-बेटी के बीच भेदभाव खत्म नहीं हो पाया है और कई मामलों में बेटियों का भविष्य गर्भ में ही तय कर दिया जा रहा है.

 

गर्भपात’ सबसे बड़ा कारण

धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से बेटियों को देवी का स्वरूप माना गया है, लेकिन आधुनिक समय की अंधी प्रतिस्पर्धा और संकीर्ण मानसिकता ने इस मान्यता को कमजोर कर दिया है. हालात यह हैं कि भ्रूण परीक्षण के बाद ‘गर्भपात’ जिले में लिंगानुपात गिरने का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है. यह केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानसिकता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है.

 

पीसीपीएनडीटी एक्ट का उल्लंघन  

हाल ही में कठौतिया तालाब के समीप एक नाले से नवजात बच्ची का शव मिलना मानवता को झकझोर देने वाली घटना रही. इस अमानवीय कृत्य ने पूरे समाज को आईना दिखाया है. घटना के बाद जिला प्रशासन सक्रिय हुआ है और पीसीपीएनडीटी एक्ट के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सख्ती दिखाई जा रही है. इसी क्रम में प्रतापपुर प्रखंड में बिना वैध दस्तावेज संचालित एक अल्ट्रासाउंड केंद्र को सील किया गया है. अनुमंडल पदाधिकारी जहूर आलम ने अवैध रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड केंद्रों और नर्सिंग होम के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की है.

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सामाजिक जागरूकता की कमी

हालांकि सच्चाई यह भी है कि जब तक पीसीपीएनडीटी एक्ट को पूरी मजबूती और निरंतर निगरानी के साथ लागू नहीं किया जाएगा, तब तक भ्रूण जांच जैसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल रहेगा. शहर से लेकर प्रखंड स्तर तक संगठित गिरोह चोरी-छिपे इस अवैध धंधे को चला रहे हैं. ऐसे में यह स्पष्ट है कि बेटियों के अस्तित्व की रक्षा केवल प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं होगी, बल्कि समाज के हर जागरूक व्यक्ति को आगे आना होगा. बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि भविष्य की नींव मानने की सोच ही इस संकट का स्थायी समाधान बन सकती है.

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