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राज्यपाल ने किया ‘उरांव धर्म एवं प्रथाएं’ पुस्तक का लोकार्पण

Ranchi : राज भवन में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने प्रख्यात मानवशास्त्री शरत चन्द्र राय की पुस्तक ‘उरांव धर्म एवं प्रथाएं’ के हिंदी अनुवाद का लोकार्पण किया. इस कृति का अनुवाद डॉ. राज रतन सहाय ने किया है.

 

कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, विधायक डॉ. रामेश्वर उरांव, सरयू राय, पूर्व सांसद सुदर्शन भगत, पूर्व विधायक गंगोत्री कुजूर सहित अनेक विद्वान, शोधकर्ता और शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े लोग उपस्थित रहे.

 

यह पुस्तक जनजातीय संस्कृति का जीवंत दस्तावेज- राज्यपाल

राज्यपाल ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि यह कृति भारत की जनजातीय परंपराओं, सामाजिक संरचना, आस्था और सांस्कृतिक जीवन को समझने का एक अमूल्य स्रोत है. शरत चन्द्र राय ने उरांव समाज के जीवन-दर्शन, परंपराओं और मान्यताओं को अत्यंत गहराई और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है.

 

उन्होंने अनुवादक डॉ. राज रतन सहाय को बधाई देते हुए कहा कि अनुवाद किसी संस्कृति के ज्ञान को विस्तृत समाज तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम है. यह हिंदी संस्करण मुख्यधारा के पाठकों को उरांव समाज की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण सेतु सिद्ध होगा.

 

जनजातीय गौरव दिवस और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान का उल्लेख

राज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाया जाना गौरव की बात है. उन्होंने कहा कि धरती आबा बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, सिद्धो-कान्हू, फूलो-झानो, वीर बुधु भगत जैसे असंख्य वीरों ने स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय योगदान दिया.

 

उन्होंने याद किया कि टाना भगत आंदोलन, जो उरांव समुदाय की सत्य, अहिंसा और आत्मसंयम की विचारधारा पर आधारित था, ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी.

 

समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता

राज्यपाल ने कहा कि भारत की जनजातीय विरासत राष्ट्र की सांस्कृतिक जड़ों का अभिन्न हिस्सा है और ऐसे शोध-आधारित प्रकाशनों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचना चाहिए. उन्होंने पुस्तक के व्यापक प्रसार की शुभकामनाएं दीं.

 

अर्जुन मुंडा ने अनुवादक को दी बधाई

पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि यह डॉ. राज रतन सहाय का तीसरा अनुवाद है, जो अपने आप में अत्यंत प्रशंसनीय है. उन्होंने कहा कि किसी भी कृति का अनुवाद करते समय भाव, अर्थ और सांस्कृतिक संदर्भों की संवेदनशीलता को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है.

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