Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने विनोबा भावे विश्वविद्यालय से संबद्ध लंगटा बाबा कॉलेज, गिरिडीह के व्याख्याता बिनोद कुमार राय के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनकी याचिका स्वीकार कर ली. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति अवैध थी और उन्हें सेवा से हटाए जाने की तिथि से पुनर्बहाली तक की अवधि का 75 प्रतिशत बकाया वेतन, वरिष्ठता और अन्य सभी परिणामी सेवा लाभ दिए जाएं.
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याचिकाकर्ता की कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनर्बहाली का अर्थ केवल नौकरी पर वापस लेना नहीं, बल्कि कर्मचारी को उसी स्थिति में बहाल करना है, जिसमें वह अवैध बर्खास्तगी से पहले था. इसलिए याचिकाकर्ता का वेतन मूल नियुक्ति की तिथि से सेवा की पूरी अवधि को ध्यान में रखते हुए पुनर्निर्धारित किया जाएगा और उन्हें सभी वार्षिक वेतनवृद्धि और संशोधित वेतनमान का लाभ मिलेगा.
मामले में याचिकाकर्ता बिनोद कुमार राय की ओर से बताया गया था कि वर्ष 1989 में उनकी नियुक्ति राजनीतिक विज्ञान के व्याख्याता के रूप में हुई थी. बाद में वे कॉलेज के वरिष्ठतम शिक्षक होने के कारण प्रभारी प्राचार्य बनाए गए. कॉलेज प्रबंधन से विवाद के बाद उन्हें पहले प्रभारी प्राचार्य पद से हटाया गया और अंततः वर्ष 2008 में बिना नियमित विभागीय जांच के सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. इसके खिलाफ उन्हें कई बार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा और यह उनकी नौवीं याचिका थी.
कोर्ट ने पाया कि विश्वविद्यालय द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति पहले ही आरोपों को सिद्ध नहीं मान चुकी थी. इसके बावजूद कॉलेज प्रबंधन ने बिना विधिसम्मत विभागीय कार्यवाही के उनकी सेवा समाप्त कर दी. बाद में विश्वविद्यालय ने स्वयं वर्ष 2019 में यह माना कि बर्खास्तगी अवैध थी और उन्हें पुनर्बहाल किया, लेकिन बकाया वेतन और अन्य सेवा लाभ नहीं दिए.
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को केवल अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत जाने के कारण लगातार प्रताड़ित किया गया. लगभग 11 वर्ष तक अवैध रूप से सेवा से बाहर रहने के बाद उन्हें पुनर्बहाल किया गया, इसलिए उन्हें न्यायोचित राहत मिलनी चाहिए. हालांकि अदालत ने यह भी माना कि इस दौरान याचिकाकर्ता ने जीविकोपार्जन के लिए संविदा पर पारा शिक्षक के रूप में कार्य किया था और मानदेय प्राप्त किया था. इसलिए आदेश दिया गया कि बकाया वेतन की गणना करते समय पारा शिक्षक के रूप में प्राप्त मानदेय की राशि घटा दी जाएगी.
कोर्ट ने 5 अप्रैल 2019 के विश्वविद्यालय के उस आदेश का वह हिस्सा भी रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता के आचरण और प्रभारी प्राचार्य बनने की योग्यता पर प्रतिकूल टिप्पणियां की गई थीं. अदालत ने कहा कि जब विश्वविद्यालय ने स्वयं नई विभागीय कार्यवाही की स्वतंत्रता दी थी, तब पहले से ही उनके विरुद्ध ऐसी टिप्पणियां करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था.
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