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सिदो-कान्हू और फूलो-झानो की धरती पर बालू माफिया का साम्राज्य!

Dumka News: सिदो-कान्हू और फूलो-झानो की इसी संघर्षभूमि पर अब अवैध बालू कारोबार फलने और फूलने लगा है. स्थानीय लोगों के अनुसार, नदी से रोज करीब 70 से 75 गाड़ियों में बालू निकाला जा रहा है. यह बालू झारखंड के अलग-अलग इलाकों के साथ पश्चिम बंगाल भी भेजे जाने का दावा है.
 
बालू ले जाने वाले ट्रकों की तस्वीर
  • मयूराक्षी नदी से रोज 70-75 गाड़ियों में अवैध बालू खनन, बंगाल तक पहुंच रहा झारखंड का बालू

ग्राउंड रिपोर्ट...

Dumka News: "हासा बां ताहेन खान, हाड़ाम कोवाः आरी बां ताहना।" जिसका अर्थ: अगर हमारी जमीन ही नहीं बचेगी, तो हमारे पुरखों की रीति-रिवाज, संस्कृति और परंपराएं भी जिंदा नहीं रहेंगी. इस तरह की बात दामिन-इ-कोह में रहने वाले बुजुर्ग आज भी कहते हैं. इसी जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए दामिन-इ-कोह में हजारों लोगों ने बलिदान दिया था. सिदो-कान्हू और फूलो-झानो की इसी संघर्षभूमि पर अब अवैध बालू कारोबार फलने और फूलने लगा है. स्थानीय लोगों के अनुसार, नदी से रोज करीब 70 से 75 गाड़ियों में बालू निकाला जा रहा है. यह बालू झारखंड के अलग-अलग इलाकों के साथ पश्चिम बंगाल भी भेजे जाने का दावा है.


बनियाग्राम, सिलाजोड़, सामपुर, परिहारपुर, एकतला और नौरांगी गांव की सीमा से लगे नदी घाटों से बालू निकाले जाने की बात सामने आ रही है. पहले बालू को अलग-अलग स्थानों पर डंप किया जाता है. इसके बाद शाम होते ही गाड़ियों की आवाजाही शुरू हो जाती है.

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तीन रूट में निकलता है बालू का काफिला

रानेश्वर थाना क्षेत्र से बालू लदे वाहन तीन प्रमुख रूटों से पश्चिम बंगाल की ओर जाने का दावा किया जा रहा है.


पहला रूट सिउड़ी की ओर है. रानेश्वर से बंगाल बॉर्डर करीब पांच किलोमीटर दूर बताया जाता है. संबंधित बालू घाटों से बॉर्डर की दूरी भी करीब तीन से चार किलोमीटर बताई जाती है.


दूसरा रूट मोहम्मद बाजार की ओर जाता है. इस रास्ते से रोज करीब 15 से 20 गाड़ियों के जाने का दावा है. आरोप है कि कई ट्रकों में पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का चालान रखा जाता है.


तीसरा रूट रघुनाथपुर और रामपुरहाट की ओर है. यह रास्ता रानेश्वर प्रखंड मुख्यालय के सामने से गुजरता है. आरोप है कि यहां से निकलने वाले बालू लदे ट्रकों में भी उत्तर 24 परगना जिले का चालान इस्तेमाल किया जाता है.


एक ट्रक बालू का रेट 50 से 55 हजार!

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, एक ट्रक बालू की कीमत करीब 50 से 55 हजार रुपये तक बताई जा रही है. इसमें करीब 30 हजार रुपये कथित तौर पर पासिंग के नाम पर लिए जाने का आरोप है.


दावा है कि इसी रकम से रास्ते में आने वाले लोगों और स्थानीय स्तर पर व्यवस्था को मैनेज किया जाता है. नदी घाट से निकलने वाले रास्तों में पड़ने वाले गांवों को भी ट्रक के हिसाब से एक से दो हजार रुपये तक दिए जाने की बात स्थानीय ग्रामीणों ने कही है.


अवैध बालू कारोबार के संचालन को लेकर स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों के नाम भी सामने आ रहे हैं. सूत्रों का आरोप है कि मंडल बंधु इस नेटवर्क को संचालित करते हैं. बड़े मंडल साहेब के करीबी बताए जाने वाले खान साहब पर ट्रकों और डंपरों की कथित पासिंग और कलेक्शन की जिम्मेदारी होने का दावा है.


वहीं राजनीतिक रसूख रखने वाले दूसरे मंडल साहेब के करीबी बताए जाने वाले बसंत, सुब्रतो और पाल पर भी स्थानीय स्तर पर नेटवर्क में भूमिका होने का आरोप है. हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.


बंगाल के चालान से झारखंड का बालू?

स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार ट्रकों में पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का चालान रखा जाता है. आरोप है कि किसी तरह की जांच या कार्रवाई की स्थिति में इसी चालान को दिखाकर बालू की ढुलाई की जाती है.

 

चालान की फोटो

 

यदि यह आरोप सही है, तो मामला केवल अवैध बालू खनन तक सीमित नहीं रहेगा. यह झारखंड की खनिज संपदा की कथित अवैध ढुलाई और दूसरे राज्य को आर्थिक लाभ पहुंचाने का गंभीर मामला भी बन सकता है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर रोजाना बड़ी संख्या में बालू लदे वाहन इलाके से गुजर रहे हैं, तो जिम्मेदार विभागों की निगरानी व्यवस्था कहां है?

थाना प्रभारी बोले - हमारे क्षेत्र से बालू नहीं निकलता


पूरे मामले में रानेश्वर थाना प्रभारी त्रिपुरी भगत से लगातार पक्ष लेने का प्रयास किया गया. उन्होंने कहा कि उनके क्षेत्र से बालू नहीं निकाला जा रहा है. जब उन्हें जीपीएस लोकेशन और गाड़ियों से जुड़ी तस्वीरों के बारे में बताया गया, तो उन्होंने खनन विभाग और जिला के बड़े अधिकारियों से बात करने को कहा. दुमका एसपी पीतांबर सिंह खेरवार से भी पक्ष लेने के लिए संपर्क किया गया. 


हालांकि उनसे संपर्क नहीं हो सका. लगातार न्यूज को संबंधित अधिकारियों का पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा.
सवाल यह है कि मयूराक्षी नदी से कथित तौर पर रोज निकल रही 50-60 बालू लदी गाड़ियों की निगरानी कौन कर रहा है? नदी से बालू निकालने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? और अगर यह कारोबार अवैध है, तो इतने बड़े नेटवर्क को संचालित करने वालों तक प्रशासन कब पहुंचेगा?

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