Ranchi : आदिवासी छात्र संघ की ओर से आज डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU) के मुख्य द्वार पर ‘बिहार के लेनिन’ के नाम से विख्यात जगदेव प्रसाद कुशवाहा की जयंती मनाई गई. इस अवसर पर छात्र-छात्राओं ने उनके चित्र पर माल्यार्पण कर सामाजिक न्याय और शोषितों के अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया.
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि भारतीय राजनीति के इतिहास में जगदेव प्रसाद कुशवाहा एक ऐसे क्रांतिकारी व्यक्तित्व थे, जिन्होंने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को राजनीतिक चेतना और अधिकारों का अहसास कराया. उन्होंने सत्ता केंद्रित राजनीति के बजाय झोपड़ियों की राजनीति को प्राथमिकता दी और शोषित-वंचित समाज को संगठित करने का काम किया.
वक्ताओं ने उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 2 फरवरी 1922 को बिहार के जहानाबाद जिले के कुर्था प्रखंड अंतर्गत कुरहारी गांव में जन्मे जगदेव बाबू ने पटना विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान यह महसूस किया कि आज़ादी के बाद भी बहुसंख्यक समाज राजनीतिक और आर्थिक गुलामी में जी रहा है. इसी चेतना ने उन्हें सामाजिक परिवर्तन की राजनीति की ओर अग्रसर किया.
उनके चर्चित नारे -दस का शासन नब्बे पर नहीं चलेगा और धन-धरती और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है -को याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि ये नारे केवल शब्द नहीं, बल्कि दलितों, पिछड़ों और वंचितों के हक़ की बुलंद आवाज़ थे. उन्होंने समाज को शोषक और शोषित वर्गों में बांटकर सामाजिक न्याय की स्पष्ट राजनीति सामने रखी.
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि 1960 के दशक में ‘शोषित दल’ के गठन के माध्यम से जगदेव प्रसाद कुशवाहा ने बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी, जिसकी नींव पर आगे चलकर मंडल आयोग और आरक्षण जैसे ऐतिहासिक फैसले संभव हो सके. एक प्रखर वक्ता होने के साथ-साथ वे निर्भीक पत्रकार भी थे, जिन्होंने अपने लेखन से सोए हुए समाज को जगाने का कार्य किया.
सभा के अंत में 5 सितंबर 1974 को कुर्था में शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी में उनकी शहादत को याद करते हुए कहा गया कि विचारों को गोलियों से खत्म नहीं किया जा सकता. उनके सपनों का समाज आज भी संघर्ष और एकता की मांग करता है.
Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें



Leave a Comment