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न गुस्सा है, न शोर, बस टूटे सपनों की मायूसी और भविष्य को लेकर गहरा डर है

Ranchi News :  जेपीएससी की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से चयनित अभ्यर्थियों के लिए पिछले कुछ दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं हैं. जिन चेहरों पर कुछ समय पहले सरकारी सेवा में चयन की चमक थी, वहां अब खामोशी है. कोई जोर से नहीं बोल रहा, कोई गुस्से में नारे नहीं लगा रहा. बस एक सवाल है, जो हर अभ्यर्थी के भीतर लगातार गूंज रहा है- आखिर हमारी गलती क्या थी?
 

Ranchi News :  जेपीएससी की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से चयनित अभ्यर्थियों के लिए पिछले कुछ दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं हैं. जिन चेहरों पर कुछ समय पहले सरकारी सेवा में चयन की चमक थी, वहां अब खामोशी है. कोई जोर से नहीं बोल रहा, कोई गुस्से में नारे नहीं लगा रहा. बस एक सवाल है, जो हर अभ्यर्थी के भीतर लगातार गूंज रहा है- आखिर हमारी गलती क्या थी?

 


11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा के परिणाम और नियुक्ति प्रक्रिया पहले ही लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजर चुकी थी. 342 अभ्यर्थी सफल हुए थे और कई को नियुक्ति पत्र भी मिल चुका था. कुछ अभ्यर्थी प्रशिक्षण में चले गए थे. लेकिन अब भर्ती प्रक्रिया पर फिर संकट खड़ा हो गया है. हाईकोर्ट में भी इस मामले को लेकर सुनवाई चलती रही है और सफल अभ्यर्थियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया है. 

 

 

 

अभ्यर्थियों के लिए यह सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं है. यह उन वर्षों का सवाल है, जो उन्होंने किताबों के बीच बिताए. यह उन माता-पिता की उम्मीदों का सवाल है, जिन्होंने बेटे-बेटियों को नौकरी की तैयारी के लिए हर संभव सहारा दिया. यह उस उम्र का सवाल है, जिसमें एक बार फिर शुरुआत करना हर किसी के लिए आसान नहीं होगा.


स्विगी के डिलीवरी ब्वॉय से अफसर बनने तक पहुंचे सूरज

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सूरज कुमार यादव की कहानी इस दर्द को सबसे करीब से दिखाती है. गिरिडीह के एक छोटे गांव से आने वाले सूरज कभी स्विगी के लिए डिलीवरी बॉय का काम करते थे. समय मिला तो रैपिडो चलाते और रात में किताबों के साथ बैठ जाते. इसी मेहनत के दम पर उन्होंने जेपीएससी परीक्षा में सफलता हासिल की. उनकी सफलता की कहानी पहले भी सामने आ चुकी है.


जिस युवक ने बाइक पर खाना पहुंचाते हुए अफसर बनने का सपना देखा था, वह आखिरकार उस मुकाम तक पहुंचा. लेकिन अब वही सपना फिर अनिश्चितता में खड़ा है.


सूरज जैसे अभ्यर्थियों के लिए नौकरी सिर्फ एक सरकारी पद नहीं थी. वह उस संघर्ष का जवाब थी, जिसमें दिन में काम और रात में पढ़ाई के बीच उन्होंने अपना भविष्य गढ़ा था.


नियुक्ति पत्र हाथ में था, अब भविष्य का सवाल सामने है

11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा में कुल 342 अभ्यर्थियों के सफल होने की जानकारी सामने आई थी. 2025 में इनमें से कई अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दिए गए थे. कुछ पदों पर नियुक्ति और प्रशिक्षण की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी. 


यानी कई अभ्यर्थियों के लिए यह परीक्षा अब सिर्फ रिजल्ट की कॉपी नहीं थी. वे सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन चुके थे. ट्रेनिंग कर रहे थे, जिम्मेदारियां संभाल रहे थे और अपने परिवार को यह भरोसा दे चुके थे कि अब जिंदगी एक नई दिशा में जा रही है.


ऐसे में अचानक पैदा हुई अनिश्चितता ने उनके भीतर सिर्फ नौकरी जाने का डर नहीं पैदा किया है. उन्हें डर है कि कहीं सालों की मेहनत, उम्र और भविष्य- तीनों एक साथ हाथ से न निकल जाएं.

 

स्वाति की कहानी में सिर्फ एक अभ्यर्थी नहीं, पूरा परिवार है

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स्वाति कुमारी उन अभ्यर्थियों में हैं, जिन्होंने इस परीक्षा के लिए करीब एक दशक तक तैयारी की. नियुक्ति पत्र मिलने का दिन उनके परिवार के लिए वर्षों की मेहनत का सबसे बड़ा फल था. आज वही परिवार इस फैसले के बाद सदमे में है.


एक सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करने वाला अभ्यर्थी अकेला नहीं पढ़ता. उसके साथ पूरा परिवार उम्मीद करता है. घर के खर्च में कटौती होती है, बच्चों की जरूरतें टलती हैं, माता-पिता अपनी छोटी-बड़ी इच्छाएं रोकते हैं. इसलिए जब चयन होता है तो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, पूरा घर जीतता है.


और जब चयन पर सवाल खड़ा होता है, तो सिर्फ एक अभ्यर्थी नहीं टूटता. उसके साथ उसके परिवार का भरोसा भी हिलता है.


एजेंसी किसने रखी, यह हमारा काम नहीं था

अभ्यर्थियों का सबसे बड़ा सवाल परीक्षा की प्रक्रिया को लेकर है. उनका कहना है कि अगर किसी एजेंसी या भर्ती व्यवस्था में गड़बड़ी हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, लेकिन उसकी कीमत ईमानदारी से परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों से क्यों वसूली जाए?

 

अभ्यर्थियों का दावा है कि उनका पीटी, मेंस और इंटरव्यू 2024 में ही पूरा हो चुका था, जबकि TDPL से जुड़ी प्रक्रिया बाद की बताई जा रही है. उनका सवाल है कि जिस प्रक्रिया में उनकी भूमिका सिर्फ परीक्षा देने और अपनी योग्यता साबित करने की थी, उसमें एजेंसी की जिम्मेदारी का बोझ उनके कंधों पर क्यों डाला जा रहा है.


यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों की जांच को लेकर पूरे राज्य में लंबे समय से आंदोलन चल रहा है. अभ्यर्थी न्याय मंच ने 11वीं-13वीं JPSC और JSSC CGL समेत कई परीक्षाओं की स्वतंत्र जांच की मांग सरकार के सामने रखी है. मंच ने यह भी मांग की है कि यदि परीक्षा रद्द होती है तो दोबारा परीक्षा अधिकतम छह महीने के भीतर कराई जाए, ताकि अभ्यर्थियों का साल बर्बाद न हो.


आठ महीने की ट्रेनिंग के बाद फिर किताबों की ओर?

इन अभ्यर्थियों का दर्द इसलिए और गहरा है क्योंकि कई पहले ही ट्रेनिंग शुरू कर चुके थे. उन्हें लगा था कि संघर्ष का सबसे मुश्किल हिस्सा खत्म हो चुका है. अब उन्हें नौकरी के लिए दोबारा वही परीक्षा, वही तैयारी और वही अनिश्चितता झेलनी पड़ सकती है.

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देवघर के विशाल आनंद भी उन सफल अभ्यर्थियों में रहे हैं, जिनकी सफलता की कहानी कभी परिवार की उम्मीदों से जुड़ी थी. जेपीएससी में सफलता के बाद उनकी कहानी को स्थानीय स्तर पर भी प्रमुखता मिली थी. 


श्रावणी मेला जैसे बड़े आयोजन में प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती में विशाल आनंद का नाम भी शामिल रहा है. आज ऐसे अभ्यर्थियों के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नौकरी रहेगी या नहीं. सवाल यह है कि जिस व्यवस्था में उन्होंने भरोसा करके कदम रखा, क्या वह भरोसा बचा रहेगा?

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अभ्यर्थियों की लड़ाई अब सड़क से अदालत तक

सरकार के फैसलों और भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्र पहले से आंदोलनरत हैं. जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में चल रहे आंदोलन में राज्य के अलग-अलग जिलों से अभ्यर्थी पहुंचे हैं. उनकी मांगों में भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई और भर्ती प्रक्रिया में स्थायी सुधार शामिल रहे हैं. अब 11वीं-13वीं के चयनित अभ्यर्थियों ने भी अपने हक की लड़ाई के लिए अदालत का रास्ता अपनाने की बात कही है.

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उनकी मांग सीधी है- अगर किसी ने गड़बड़ी की है तो उसे खोजिए, जांचिए और सजा दीजिए. लेकिन जिस अभ्यर्थी ने अपनी मेहनत से परीक्षा पास की, उसे बिना उसकी गलती के दोबारा उसी अंधेरे में क्यों धकेला जाए?


सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, भरोसे का है

सरकारी भर्ती की परीक्षा किसी युवा के लिए सिर्फ प्रश्नपत्र और रिजल्ट नहीं होती. उसके पीछे कई साल की मेहनत, परिवार की उम्मीद, आर्थिक संघर्ष और उम्र का एक बड़ा हिस्सा जुड़ा होता है.

सिस्टम में गड़बड़ी हो तो उसे ठीक करना जरूरी है. दोषी मिले तो कार्रवाई भी जरूरी है. लेकिन इसी प्रक्रिया में अगर निर्दोष अभ्यर्थी भी अपनी नौकरी, उम्र और भविष्य गंवाने लगें, तो व्यवस्था से एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए.

क्योंकि इन अभ्यर्थियों के चेहरों पर इस वक्त शायद सबसे ज्यादा जो चीज दिखाई दे रही है, वह गुस्सा नहीं है.

वह डर है.

कल का डर.

फिर से शुरुआत करने का डर.

और उस सपने के दोबारा टूट जाने का डर, जिसे पाने में उनकी जिंदगी के कई साल लग गए.

न गुस्सा है, न शोर. बस टूटे सपनों की खामोशी है और भविष्य को लेकर गहरा डर है.

 

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