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आदिवासी महाजुटान की हुंकार, कहा- आदिवासी सीटें घटाया तो ईंट से ईंट बजा देंगे

Ranchi News : कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि परिसीमन केवल चुनावी मुद्दा नहीं है. यह तय करेगा कि आने वाले समय में आदिवासियों की राजनीतिक आवाज कितनी मजबूत रहेगी. उन्होंने कहा कि 2007 में भी सीटों को लेकर परिसीमन का विरोध किया गया था और कांग्रेस ने दिल्ली जाकर इसका विरोध किया था.
 
आदिवासी महाजुटान में जुटे नेता

Ranchi News : मोरहाबादी मैदान में रविवार को आदिवासी महाजुटान महारैली का आयोजन हुआ. इसमें झारखंड के 24 जिलों से आदिवासी समाज पारंपरिक वेशभूषा में रैली में पहुंचे. सुबह से ही मोरहाबादी मैदान में लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था. 

 

रैली में परिसीमन, आदिवासियों की राजनीतिक भागीदारी, जल-जंगल-जमीन और विस्थापन समेत कई मुद्दे उठाए गए. मंच का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण मुंडा और पूर्व मेयर रमा खलखो ने किया.


रैली में झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो, के. राजू, कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, सांसद सुखदेव भगत, कोलेबिरा विधायक विल्सन कोनगाड़ी समेत कई विधायक, जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए. सांसद सुखदेव भगत ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी का संदेश पढ़कर सुनाया. संदेश में आदिवासी एकता महाजुटान को बधाई देते हुए झारखंड के इतिहास और आदिवासी संघर्ष का उल्लेख किया गया.

 

सुखदेव भगत ने कहा कि यह केवल सीटों का सवाल नहीं, बल्कि आदिवासियों के अधिकार और राजनीतिक आवाज की लड़ाई है. उन्होंने कहा कि परिसीमन की कैंची नहीं चलेगी. आदिवासी आवाज न दबेगी और न आदिवासी सीट घटेगी.


बंधु तिर्की बोले- झारखंड को नागपुर का हेड ऑफिस नहीं बनने देंगे

पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि यह बिरसा मुंडा की धरती है और झारखंड के निर्माण में हजारों लोगों ने बलिदान दिया है. यह लड़ाई केवल लोकसभा और विधानसभा की सीट बचाने की नहीं, बल्कि झारखंड की अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई है.

 

आज धर्म के नाम पर आदिवासी समाज को बांटने की कोशिश की जा रही है जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन के जरिए आदिवासियों की सीटें घटाने और पांचवीं अनुसूची को कमजोर करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा.

 

उन्होंने विस्थापन, खनिज संपदा और रॉयल्टी के मुद्दे पर भी केंद्र सरकार को घेरा. कहा कि झारखंड से कोयला और अन्य खनिज ले जाने की नीतियों का विरोध किया. उन्होंने छत्तीसगढ़ में आदिवासी जमीन और जंगलों से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया. बंधु तिर्की ने कहा कि यह रैली नहीं, रैला है. आदिवासियों की सीट कम हुई तो ईंट से ईंट बजा देंगे. झारखंड को नागपुर का हेड ऑफिस नहीं बनने दिया जाएगा.

 

शिल्पी नेहा तिर्की बोलीं- परिसीमन चुनावी नहीं, अधिकारों का मुद्दा

कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि परिसीमन केवल चुनावी मुद्दा नहीं है. यह तय करेगा कि आने वाले समय में आदिवासियों की राजनीतिक आवाज कितनी मजबूत रहेगी. उन्होंने कहा कि 2007 में भी सीटों को लेकर परिसीमन का विरोध किया गया था और कांग्रेस ने दिल्ली जाकर इसका विरोध किया था.

 

उन्होंने कहा कि सीएनटी, एसपीटी और पांचवीं अनुसूची जैसे संवैधानिक प्रावधान है. बावजूद इसके आदिवासी समाज की जमीन घटती जा रही है. इसके साथ ही आदिवासियों की संख्या में कमी आई है. अब इसी जनसंख्या को आधार बनाकर सीटें कम करने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि यह मुद्दा आने वाले समय में सड़क से लेकर दिल्ली तक गूंजेगा.


राजेश कच्छप बोले- आदिवासियों की सीटें बढ़ानी होंगी

खिजरी विधायक राजेश कच्छप ने कहा कि परिसीमन प्रक्रिया के आधार पर आदिवासी सीटों को जनसंख्या के हिसाब से कम करने की कोशिश हो रही है.

 

उन्होंने कहा कि खनिज संपदा वाले इलाकों में रहने वाले आदिवासियों को अलग-अलग कानूनों के जरिए विस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है. जब तक परिसीमन को लेकर बंटवारे और अधिकारों का सवाल हल नहीं होता, आंदोलन जारी रहेगा. उन्होंने कहा कि यदि अन्य वर्गों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात होती है तो आदिवासी और एससी वर्ग की सीटें भी बढ़नी चाहिए.

 

 

विधायकों ने भी परिसीमन प्रक्रिया का किया विरोध

कोलेबिरा विधायक विल्सन कोनगाड़ी ने कहा कि आदिवासी समाज अपने पूर्वजों के संघर्ष और संवैधानिक अधिकारों की वजह से आज अपनी पहचान बनाए हुए है. आदिवासी समाज की एकता को तोड़ने की साजिश की जा रही है.

 

सिमडेगा विधायक भूषण बाड़ा ने कहा कि केंद्र सरकार आदिवासी समाज को छलने का काम कर रही है. उन्होंने कहा कि आदिवासियों की जमीन लगातार कम हो रही है और डैम, कारखानों और अन्य परियोजनाओं के कारण बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं. तमाड़ विधायक विकास मुंडा ने कहा कि 2007 में भी परिसीमन के विरोध के बीच आदिवासी सीटों को बचाया गया था.

 

उन्होंने असम में हुए परिसीमन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां परिसीमन से आदिवासी समुदाय को नुकसान हुआ. उन्होंने वन अधिकार कानून और हसदेव के जंगलों का मुद्दा भी उठाया.

 

दयामनी बारला बोलीं- सीट घटाई तो आर-पार की लड़ाई

सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि आदिवासियत को बचाने के लिए लोग महाजुटान में पहुंचे हैं. उन्होंने कहा कि झारखंड की लड़ाई में आदिवासी समाज के हर व्यक्ति ने भागीदारी निभाई थी. परिसीमन के नाम पर यदि आदिवासियों की राजनीतिक हिस्सेदारी कम करने की कोशिश हुई तो आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी.

 

उन्होंने कहा कि झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित 28 सीटों को कम करने के बजाय उनकी संख्या बढ़ाई जानी चाहिए. आदिवासियों के अधिकारों को खत्म करने का प्रयास हुआ तो आंदोलन के जरिए इसका विरोध किया जाएगा. उन्होंने खनिज संपदा और जमीन के मुद्दे पर भी केंद्र सरकार को घेरा और कहा कि झारखंड की एक इंच जमीन भी लूटने नहीं दी जाएगी.

 

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