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छात्रों की मौजूदगी में सदन से पारित हुआ विश्वविद्यालय विधेयक, सुदिव्य कुमार ने छात्र हितों को बताया सर्वोपरि

Ranchi: झारखंड विधानसभा में झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2026 को लेकर आज का दिन खास रहा. जब सदन में राज्य की उच्च शिक्षा की दिशा तय की जा रही थी, उसी दौरान दर्शक दीर्घा में डीएवी विवेकानंद पब्लिक स्कूल, बेड़ो के छात्र-छात्राएं पूरी कार्यवाही को देख रहे थे. व्यापक चर्चा और विभिन्न संशोधनों पर विचार के बाद सदन ने विधेयक को पारित कर दिया.

 

सदन में खंड 41 की कार्यवाही के बाद खंड 42 से खंड 93 तक को बिना किसी संशोधन के स्वीकृति दी गई और इन्हें विधेयक का हिस्सा बनाया गया. इसके बाद आगे के खंडों पर सदस्यों द्वारा लाए गए संशोधनों पर विस्तार से चर्चा हुई.

 

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विधायक जयराम महतो ने खुद को एक शोधार्थी बताते हुए छात्र हितों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए. खंड 94 पर उन्होंने मांग की कि विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और योग्यता आधारित हो. साथ ही सभी नियम और पात्रता शर्तें शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले वेबसाइट पर प्रकाशित की जाएं. उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी छात्र का नामांकन अस्वीकार होता है तो उसे लिखित कारण और अपील का अवसर मिलना चाहिए. 


इसपर मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि वे स्वयं भी पहले छात्र रहे हैं और छात्रों की समस्याओं को समझते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार नियमों के माध्यम से लिखित सूचना और अपील का अधिकार सुनिश्चित करेगी, इसलिए अलग संशोधन की जरूरत नहीं है.

 

 

 

खंड 95 पर जयराम महतो ने छात्र शिकायतों के निपटारे के लिए 30 दिनों की समय सीमा तय करने का प्रस्ताव रखा. इस पर मंत्री सुदिव्य कुमार ने बताया कि खंड 100 में पहले से ही छात्र शिकायत निवारण समिति का प्रावधान है, जो यूजीसी विनियम 2023 के तहत काम करेगी और इसमें 30 दिनों के भीतर लोकपाल के समक्ष अपील की व्यवस्था भी है.

 

खंड 96 पर परीक्षा कार्यक्रम को शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत में प्रकाशित करने की मांग की गई, जिस पर मंत्री ने कहा कि इसे नियमों के जरिए सुनिश्चित किया जाएगा. खंड 97 पर परीक्षा परिणाम की समय सीमा 45 दिन से घटाकर 30 दिन करने का प्रस्ताव रखा गया. मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि सामान्य स्थिति में 30 दिन का प्रयास रहेगा, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से अधिकतम 45 दिन की सीमा व्यवहारिक है. उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों को पुनर्मूल्यांकन और पुनर्गणना का अधिकार परिनियमों के तहत दिया जाएगा.

 

खंड 98 और 99 पर प्रशासनिक देरी की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था और खेलकूद तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में पारदर्शी चयन की मांग उठी. मंत्री सुदिव्य कुमार ने आश्वासन दिया कि सरकार विद्यार्थियों के हितों की समीक्षा करेगी और चयन प्रक्रिया निष्पक्ष रखी जाएगी.

 

खंड 143 को लेकर सदन में सबसे तीखी बहस देखने को मिली. विधायक राज सिन्हा और अमित कुमार यादव ने संशोधन प्रस्ताव रखते हुए कहा कि विश्वविद्यालय सेवा आयोग का अध्यक्ष किसी प्रशासनिक अधिकारी के बजाय शिक्षाविद होना चाहिए. राज सिन्हा ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों के पास शैक्षणिक अनुभव नहीं होता, जिससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है. अमित कुमार यादव ने भी कहा कि ऐसे पद पर वही व्यक्ति होना चाहिए जिसके पास 20 से 25 वर्षों का शैक्षणिक अनुभव हो.

 

इस पर मंत्री सुदिव्य कुमार ने जवाब देते हुए कहा कि आयोग एक नियामक संस्था है, जिसे बड़े स्तर पर नियुक्तियां और प्रोन्नति का काम करना है, इसलिए प्रशासनिक अनुभव जरूरी है. उन्होंने उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियम 2023 का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां भी इसी तरह का प्रावधान है. उन्होंने कहा कि जेपीएससी पर बढ़ते बोझ को कम करने के लिए इस समर्पित संस्था का गठन किया जा रहा है.

 

इसके बाद खंड 144 से 169 तक के प्रावधानों पर चर्चा हुई और उन्हें स्वीकृति दी गई. साथ ही विधेयक की अनुसूची, प्रस्तावना और नाम को भी मंजूरी दी गई. इसके बाद मंत्री सुदिव्य कुमार ने विधेयक को स्वीकृत करने का प्रस्ताव रखा, जिसे सदन ने बहुमत से पारित कर दिया.

 

विधानसभा अध्यक्ष ने उपस्थित छात्र-छात्राओं का स्वागत करते हुए कहा कि यह उनके लिए सीखने का अच्छा अवसर है, जिससे वे समझ सकते हैं कि कानून कैसे बनते हैं और राज्य के भविष्य को कैसे प्रभावित करते हैं. इसके साथ ही सदन की कार्यवाही 18 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी गई.

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