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4जी के जमाने में भी 2जी ई-पॉश मशीन का उपयोग, राशन के लिए घंटों करना पड़ता है इंतजार

sanjeet yadav  Palamu: भले ही हमलोग 4G , 5G के जमाने में जी रहे हैं लेकिन झारखंड के जनवितरण प्रणाली के दुकानों में अभी भी 2जी ई-पॉश मशीन का उपयोग हो रहा है. राशन वितरण करने में 2G ई-पॉश मशीन का उपयोग करने से कई तरह की परेशानियां सामने आ रही है. नेटवर्क नहीं रहने के कारण कई घंटों तक राशन के लिए इंतजार करना पड़ता है. नेटवर्क नहीं रहने पर ई-पॉश मशीन कोई काम ही नही करता. इसे भी पढ़ें-चाईबासा">https://lagatar.in/chaibasa-your-plan-your-government-your-door-program-organized-in-the-city-council-area/">चाईबासा

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दुकानदार घूम-घूमकर ढूंढ़ते हैं नेटवर्क

जन वितरण प्रणाली का राशन देने के लिए दुकानदारों को घूम-घूमकर नेटवर्क ढूंढना पड़ता है. पलामू जिले के मनातू, छतरपुर, हरिहरगंज, रामगढ़, चैनपुर और पांडू अति नक्सली क्षेत्र है जहां नेटवर्क की समस्या हमेशा बनी रहती है. इन जगहों के जन वितरण प्रणाली के दुकानदारों का कहना है कि नेटवर्क नहीं रहने पर 3 से 5 किलोमीटर ऊंचे जगह या पहाड़ पर जाकर नेटवर्क ढूढ़ते हैं. कभी-कभी तो नेटवर्क नहीं पकड़ता है तो राशन लेने आया व्यक्ति नाराज हो जाता है. उनका आरोप होता है कि सब बहाना है, राशन गबन करने के फेर में ये लोग रहते हैं. दुकानदारों को ये सब सुनना पड़ता है. नाराज लोगों को दुकानदार मनाते रहते हैं. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/10/rrr-3.jpg"

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डोंगल उपलब्ध कराने की कोशिश

इस बाबत पलामू जिला आपूर्ति पदाधिकारी शबीर अहमद ने बताया कि ये समस्या सुनने को मिल रही है. समस्या को दूर करने के लिए डोंगल प्रयोग किया जा रहा है. 75 डोंगल उपलब्ध कराया गया है. पलामू में जहां पर नेटवर्क की समस्या रहती है उस जगह को चिन्हित कर वहां के जन वितरण प्रणाली के दुकानदारों को डोंगल उपलब्ध कराया जाएगा. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/10/rrrr-6.jpg"

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विधानसभा में उठा था ई-पॉश मशीन का मामला

बता दे कि जिस ई-पॉश मशीन की कीमत 25 हजार रुपए है, उसे खरीदने के बजाए भाड़ा मद में अब तक सरकार प्रति ई-पॉश मशीन 45 हजार खर्च कर चुकी है. इसे लेकर विधानसभा के शीतकालीन सत्र में विधायक प्रदीप यादव ने सवाल खड़ा करते हुए कहा था कि 24 हजार रुपए के एक मशीन का सरकार 5 सालों से 45 हजार रुपए किराया देते आ रही है. उन्होंने पूछा कि सैकड़ों करोड़ रेंट देने की जगह क्या सरकार इसका वैकल्पिक इंतजाम नहीं कर सकती थी? इस पर खूब हंगामा भी हुआ था. [wpse_comments_template]

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