Dehradun : उत्तराखंड के हल्द्वानी बनभूलपुरा रेलवे जमीन अतिक्रमण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज मंगलवार को रेलवे के पक्ष में फैसला सुनाया. आदेश जारी कर कहा कि रेलवे की लगभग 29 एकड़ जमीन पर से अवैध कब्जा हटाया जाये.
सुप्रीम कोर्ट ने 19 मार्च के बाद सर्वे शुरू करने का आदेश दिया. कोर्ट ने प्रभावित लोगों को आगामी 6 माह तक दो-दो हजार रुपये देने का भी आदेश दिया. इस पर केंद्र सरकार की ओर से पेश ASG ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार विस्थापन के बाद जो पात्र लोग हैं उन्हें 6 माह तक भत्ता देगी.
CJI सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें (अतिक्रमणकारी) वहीं रहने क्यों दिया जाये. कहा कि किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के लिए दोनों तरफ खाली जगह की जरूरत होती है. वहां रहने वाले लोग यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे को लाइन कहां बिछानी चाहिए.
सुनवाई के क्रम में जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि यह राज्य की ज़मीन है. जमीन का इस्तेमाल कैसे करना है, यह तय करना राज्य का अधिकार है. अब मुद्दा यह बचा है कि जब अतिक्रमणकारियों को वहां से हटाया जायेगा, तो उनका पुनर्वास कैसे किया जायेगा. ताकि उन्हें कुछ सहारा मिल सके.
अपने फैसले में कोर्ट ने नैनीताल राजस्व प्राधिकरण, जिला प्रशासन और रेलवे को निर्देश दिया कि वे कैंप लगायें, ताकि कमजोर वर्ग के पात्र प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवेदन कर सकें. खबर है कि 19 मार्च, ईद के बाद एक सप्ताह का विशेष कैंप लगाया जायेगा.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई अप्रैल में करने को कहा है. तब तक रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी.
सुनवाई के क्रम में याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि लगभग 50 हजार लोग दशकों से वहां रह रहे हैं कहा कि यह पट्टे की जमीन है. रेलवे ने इससे पूर्व कभी भी इस जमीन की मांग नहीं की. प्रशांत भूषण ने सुझाव दिया कि रेलवे के पास पहले से ही बनभूलपुरा के बगल में ही खाली जमीन पड़ी है. रेलवे इसका इस्तेमाल कर सकता है.
प्रशांत भूषण की बात पर CJI ने नाराजगी जताई. कहा कि कब्जा करने वाले तय नहीं कर सकते कि रेलवे को किस जमीन का इस्तेमाल करना है. बता दें कि इलाके के इंदिरा नगर, बनभूलपुरा, छोटी लाइन, गफूर बस्ती और लाइन नंबर इलाके में अतिक्रमण का मुद्दा लंबे समय से चर्चित रहा है.
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