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वेटलिफ्टिंग: मीराबाई चानू से कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड की उम्मीद, कभी जंगल में बिनती थी लकड़ी

New Delhi: कॉमनवेल्थ गेम्स में वेटलिफ्टर मीराबाई चानू से भारतवासियों को गोल्ड की उम्मीद है. बता दें कि टोक्यो ओलिंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रचने वाली मीराबाई चानू के नाम कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 में सिल्वर और 2018 में गोल्ड है. बर्मिंघम में उनकी कोशिश होगी कि वह एक बार फिर तिरंगे का मान बढ़ाएं. 27 वर्ष की मीराबाई के बारे में बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि वह एक बेहद गरीब परिवार से आती हैं. यही चीज उनके लिए वरदान साबित हुआ. वह अपने भाई-बहनों के साथ जंगल में लकड़ी बिनने जाती थीं और उसका गठ्ठर बांधकर घर लाती थीं.

लकड़ी उठाना मीराबाई के लिए बना वरदान

मीराबाई चानू ने 12 साल की उम्र में ही ज्यादा वजन उठाने के अपने हुनर का परिचय दे दिया था. तब वह अपने बड़े भाई से अधिक वजनी लकड़ियां आसानी से उठा लेती थीं. जंगल से यह लकड़ी वह जलावन के लिए इकट्ठा करती थीं, लेकिन बचपन से उनका यह अभ्यास आखिर में उनके काम आया और वह देश की चोटी की वेटलिफ्टर बन गईं. इसे भी पढ़ें-ICC">https://lagatar.in/icc-test-rankings-babar-azam-in-top-3-in-all-three-formats-pant-remains-at-5th-position/">ICC

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अपने प्रदर्शन से आलोचकों का मुंह किया बंद

रियो ओलिंपिक में लचर प्रदर्शन के बाद इस भारोत्तोलक की आलोचना हुई थी, लेकिन उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स और फिर ओलिंपिक में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए सभी आलोचकों की बोलती बंद कर दी. चानू ने गोल्ड कोस्ट में 48 किग्रा में स्नैच, क्लीन एवं जर्क का खेलों का रिकॉर्ड बनाकर भारत गोल्ड मेडल दिलाया था. फिर तोक्यो ओलिंपिक में भारत को सिल्वर के रूप में पहला मेडल दिलाया. इस प्रदर्शन के लिए मणिपुर के सीएम बिरेन सिंह ने एक करोड़ रुपये के इनाम से सम्मानित किया था.

बड़े भाई से ज्यादा वजन उठाती थी 

इम्फाल से 20 किमी दूर नोंगपोक काकचिंग गांव में गरीब परिवार में जन्मी और छह भाई बहनों में सबसे छोटी मीराबाई अपने से चार साल बड़े भाई सैखोम सांतोम्बा मीतेई के साथ पास की पहाड़ी पर लकड़ी बीनने जाती थीं. इस बारे में सांतोम्बा ने एक इंटरव्यू में कहा था, `एक दिन मैं लकड़ी का गठ्ठर नहीं उठा पाया, लेकिन मीरा ने उसे आसानी से उठा लिया और वह उसे लगभग 2 किमी दूर हमारे घर तक ले आई. तब वह 12 साल की थी.` इसे भी पढ़ें-देवघर">https://lagatar.in/deoghar-unique-tradition-of-shiv-shakti-alliance-is-visible-only-in-baidyanath-dham-jyotirlinga/">देवघर

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शुरू से ही जुनूनी थी मीराबाई

राज्य स्तर के जूनियर फुटबॉलर रहे सांतोम्बा ने कहा, `मैं तब फुटबॉल खेलता था और मैंने उसमें कुछ करने का जुनून देखा था. वह फिर वेटलिफ्टिंग से जुड़ गईं. वह हमेशा कुछ हासिल करने के लिए जुनूनी थीं. वह कभी दबाव में नहीं आती और शांत चित रहती हैं.` सांतोम्बा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद कहा था, `मेरी मां और पिताजी तब आंसू नहीं थाम पाए थे. कुछ देर के लिए वे निशब्द थे.` जब भी मीराबाई मेडल जीतती हैं तो गांव लोग पारंपरिक लोकनृत्य थाबल चोंग्बा के साथ जश्न मनाते हैं. अब जब मीराबाई कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए बर्मिंघम में हैं तो एक बार फिर पूरे देश को उनसे गोल्ड की उम्मीद है. [wpse_comments_template]

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