लकड़ी उठाना मीराबाई के लिए बना वरदान
मीराबाई चानू ने 12 साल की उम्र में ही ज्यादा वजन उठाने के अपने हुनर का परिचय दे दिया था. तब वह अपने बड़े भाई से अधिक वजनी लकड़ियां आसानी से उठा लेती थीं. जंगल से यह लकड़ी वह जलावन के लिए इकट्ठा करती थीं, लेकिन बचपन से उनका यह अभ्यास आखिर में उनके काम आया और वह देश की चोटी की वेटलिफ्टर बन गईं. इसे भी पढ़ें-ICC">https://lagatar.in/icc-test-rankings-babar-azam-in-top-3-in-all-three-formats-pant-remains-at-5th-position/">ICCटेस्ट रैंकिंग: बाबर आजम तीनों फॉर्मेट में टॉप 3 में, पंत 5वें स्थान पर कायम
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अपने प्रदर्शन से आलोचकों का मुंह किया बंद
रियो ओलिंपिक में लचर प्रदर्शन के बाद इस भारोत्तोलक की आलोचना हुई थी, लेकिन उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स और फिर ओलिंपिक में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए सभी आलोचकों की बोलती बंद कर दी. चानू ने गोल्ड कोस्ट में 48 किग्रा में स्नैच, क्लीन एवं जर्क का खेलों का रिकॉर्ड बनाकर भारत गोल्ड मेडल दिलाया था. फिर तोक्यो ओलिंपिक में भारत को सिल्वर के रूप में पहला मेडल दिलाया. इस प्रदर्शन के लिए मणिपुर के सीएम बिरेन सिंह ने एक करोड़ रुपये के इनाम से सम्मानित किया था.बड़े भाई से ज्यादा वजन उठाती थी
इम्फाल से 20 किमी दूर नोंगपोक काकचिंग गांव में गरीब परिवार में जन्मी और छह भाई बहनों में सबसे छोटी मीराबाई अपने से चार साल बड़े भाई सैखोम सांतोम्बा मीतेई के साथ पास की पहाड़ी पर लकड़ी बीनने जाती थीं. इस बारे में सांतोम्बा ने एक इंटरव्यू में कहा था, `एक दिन मैं लकड़ी का गठ्ठर नहीं उठा पाया, लेकिन मीरा ने उसे आसानी से उठा लिया और वह उसे लगभग 2 किमी दूर हमारे घर तक ले आई. तब वह 12 साल की थी.` इसे भी पढ़ें-देवघर">https://lagatar.in/deoghar-unique-tradition-of-shiv-shakti-alliance-is-visible-only-in-baidyanath-dham-jyotirlinga/">देवघर: सिर्फ बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग में ही दिखती है शिव शक्ति गठजोड़ की अनूठी परंपरा
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