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इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी से फर्क किसे पड़ता है!

राजनीति, ब्यूरोक्रेसी व पुलिस को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक ताजा टिप्पणी आयी है. न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा है- राजनीतिक और नौकरशाही तंत्र की "सामंती मानसिकता" ने संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत (निजी) प्रभुत्व का साधन बना दिया है. उन्होंने पुलिस पर टिप्पणी यह की है कि पुलिस अधिकारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि बदलती सरकारों के प्रति अधिक झुकाव रखते हैं.
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राजनीति, ब्यूरोक्रेसी व पुलिस को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक ताजा टिप्पणी आयी है. न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा है- राजनीतिक और नौकरशाही तंत्र की "सामंती मानसिकता" ने संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत (निजी) प्रभुत्व का साधन बना दिया है. उन्होंने पुलिस पर टिप्पणी यह की है कि पुलिस अधिकारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि बदलती सरकारों के प्रति अधिक झुकाव रखते हैं. 

 


कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में आगे कहा- अधिकारी मनपसंद और मलाईदार पोस्टिंग (जैसे शहरी कमिश्नरेट या आकर्षक जिले) पाने के लिए अपने आचरण को राजनीतिक आकाओं की पसंद के अनुसार ढाल लेते हैं. अधिकारियों के कैडर का एक बड़ा हिस्सा कानून के शासन को संवैधानिक दायित्व मानने के बजाय एक 'ऑपरेशनल असुविधा' (कामकाजी बाधा) समझता है. संवैधानिक शासन को किसी की व्यक्तिगत सुविधा का बंधक नहीं बनाया जा सकता. 

 


सवाल यह उठता है कि इस टिप्पणी से फर्क किसे पड़ता है. सरकार को, ब्यूरोक्रेसी को, पुलिस अधिकारी को या आम जनता को. ईमानदारी से कहें तो किसी को नहीं. सभी इस सिस्टम में खप गये हैं. पावर के सामने पंगु बन जाना सबकी नियती बन गई है. अगर 20-25 साल पहले ऐसे टिप्पणी आये होते तो हंगामा खड़ा हो जाता. मीडिया में प्रमुखता से खबरें होती और इस पर बहस होते. पर, अब तो इसकी चर्चा तक ठीक से नहीं होते.

 

 

कोर्ट की यह टिप्पणी भले ही उत्तर प्रदेश के ब्यूरोक्रेसी व पुलिस पर है. लेकिन क्या देश के दूसरे राज्यों में कुछ अलग हालात हैं? जवाब है नहीं. यह तंत्र हर दिन गिरावट की नई इबारत लिख रहा है. क्या इस सबके पीछे ट्रांसफर पोस्टिंग का मायाजाल है? बिल्कुल नहीं. यह सब अकूत संपत्ति अर्जित करने की ख्वाहिश का परिणाम है. राजनीति अगर ब्यूरोक्रेसी व पुलिस को हल्का झुकाने की कोशिश करती है, तो वह रेंगने लगती है. ऐसे जैसे कि इसी का तो इंतजार था उन्हें.

 

 

बिहार के रिशु श्री का मामला देख लीजिये. ब्यूरोक्रेसी एक ठेकेदार का गुलाम बन गया. बिहार की शराब तस्करी को देख लीजिये. 90 प्रतिशत से अधिक पुलिस वाले इस धंधे से लाभ कमा रहे हैं. कुछ तो तस्करों के पार्टनर जैसे हो गए हैं. घूस नहीं, कमीशन नहीं, हिस्सेदारी तय कर ली है. पर क्या किसी को कोई फर्क पड़ रहा है.

 

 

झारखंड में ही देख लें. कौन नहीं जानता कौन-कौन अफसर बालू का कारोबार कर रहा है. बालू कारोबार में पार्टनर जैसा है. 90 हजार टन बालू चोरी हो जाता है, सिस्टम के जिम्मेदार पर कार्रवाई नहीं होती. आयरन ओर, कोयला, पत्थर, इन सबके अवैध कारोबार में किसे सबसे अधिक हिस्सा मिल रहा है? सबको पता है. पर किसी को फर्क नहीं पड़ता. 

 

 

राजनेता को बहुत अधिक पैसा चाहिए. क्योंकि उसे हर पांच साल बाद चुनाव लड़ने हैं. चुनाव में जनता को भी पैसा चाहिए. शराब चाहिए. कैश चाहिए. यह पैसा कौन लायेगा? ब्यूरोक्रेट्स व पुलिस. सिस्टम को कौन चलाता है? यही ब्यूरोक्रेट्स व पुलिस. इन्हें संरक्षण कौन देता है? सत्ता. फिर यह रूकेगा कैसे? असंभव तो नहीं पर आज के समय में संभव भी नहीं. इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी से भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

 

 

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