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क्या गठबंधन के 56 विधायक 56 ही रहेंगे या 18 जून को रास्ते में एक छूट जाएंगे!

Ranchi: झारखंड में 18 जून को राज्यसभा की दो सीटों के लिए वोट पड़ने हैं, लेकिन रांची के सियासी गलियारों में जो चर्चा है, वो यह नहीं कि कौन जीतेगा. चर्चा यह है कि कौन टिकेगा. जी हां, लड़ाई संसद पहुंचने की नहीं, अपने ही विधायकों को बिकने से बचाने की है.

 

नंबर गेम देखें तो इंडिया गठबंधन के पास 56 विधायक हैं. एक सीट के लिए चाहिए सिर्फ 28 वोट. यानी JMM के वैद्यनाथ राम और कांग्रेस के प्रणव झा की जीत तो कागज पर पक्की थी. लेकिन कागज और जमीन के बीच जो खाई होती है, उसका नाम झारखंड की राजनीति में परिमल नाथवानी है.

 

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उद्योगपति और निर्दलीय उम्मीदवार नाथवानी ने ऐन वक्त पर पर्चा दाखिल किया और भाजपा ने फौरन उनके पीछे अपनी ताकत लगा दी. NDA के पास खुद 24 वोट हैं, जीत के लिए चाहिए 28. तो वो चार वोट कहां से आएंगे, यही सवाल इस पूरे चुनाव की जान है. और यही सवाल गठबंधन के नेताओं की नींद उड़ा रहा है.

 

झारखंड का इतिहास गवाह है कि यहां राज्यसभा चुनाव आते ही विधायकों के फोन अचानक बंद होने लगते हैं और रिसॉर्ट्स की बुकिंग अचानक फुल हो जाती है. 2016 में JMM के बसंत सोरेन के पास नंबर थे, फिर भी हारे क्योंकि क्रॉस वोटिंग ने उनकी जीत छीन ली.

 

तो इस बार कांग्रेस और JMM भाजपा पर सीधा आरोप लगा रहे हैं कि धनबल के दम पर पिछले दरवाजे से घुसने की कोशिश हो रही है. भाजपा कहती है कि नाथवानी झारखंड के पुराने प्रतिनिधि हैं, कोई बाहरी नहीं. लेकिन इस आरोप-प्रत्यारोप के शोर में एक बुनियादी सवाल दब जाता है कि आखिर क्यों हर बार इस राज्य में विधायक खरीदे-बेचे जाने की नौबत आती है.

 

18 जून को जब वोट पड़ेंगे तो दो नाम जीतेंगे. लेकिन असली इम्तिहान उससे पहले ही होगा, जब पता चलेगा कि गठबंधन के 56 विधायक उस दिन भी 56 हैं, या रास्ते में कुछ कम हो गए.

 

यह चिंता सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी दिखाई दे रही है. 18 जून को ही देश के 10 राज्यों की कुल 24 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होना है, जिसमें झारखंड के अलावा मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी राजनीतिक पारा बढ़ा हुआ है. मध्यप्रदेश में कांग्रेस अपने विधायकों को बेंगलुरु के रिसॉर्ट ले गई है, तो कर्नाटक में भी अंदरूनी क्रॉस वोटिंग का डर बना हुआ है. 

 

हालांकि गुजरात, राजस्थान और आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों में समीकरण काफी हद तक स्पष्ट हैं और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी चुनावी हलचल शांत है, लेकिन झारखंड इस पूरे राष्ट्रीय चुनाव का सबसे संवेदनशील केंद्र बन गया है.

 

झारखंड में सांसद चुनने से ज्यादा विधायकों को बचाने की यह लड़ाई अब देश के सामने एक बड़ा सियासी संदेश बन चुकी है. अब देखना यह है कि 18 जून को गठबंधन का खेमा सुरक्षित रहता है या पर्दे के पीछे का मैनेजमेंट एक बार फिर पुराना इतिहास दोहरा देता है.

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