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DSPMU दीक्षांत समारोह में राज्यपाल बोले- ज्ञान के साथ विवेक, चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी जरूरी

Ranchi News : राज्यपाल ने भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का उल्लेख करते हुए “विद्या ददाति विनयम्” का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि सच्ची विद्या व्यक्ति को विनम्रता, विवेक और संस्कार प्रदान करती है. उन्होंने नालंदा महाविहार का उल्लेख करते हुए कहा कि इस महान शिक्षा केंद्र ने भारत की ज्ञान परंपरा को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया और देश-विदेश के विद्यार्थियों एवं विद्वानों को आकर्षित किया.
 
डिग्रियां प्रदान की

Ranchi News : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU), रांची का तृतीय दीक्षांत समारोह आज दीक्षांत मंडप में आयोजित किया गया. समारोह के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति सह राज्यपाल संतोष कुमार गांगवार रहे. समारोह में विभिन्न पाठ्यक्रमों के कुल 6,415 विद्यार्थियों को उपाधि प्रदान की गई. इनमें 3,065 छात्र और 3,350 छात्राएं शामिल हैं. वहीं, 142 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किया गया, जिनमें 93 छात्राएं और 49 छात्र हैं. इसके अलावा 20 विद्यार्थियों को पीएचडी की डिग्री प्रदान की गई.

 

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समारोह में यूजी सत्र 2022-25, पीजी सत्र 2023-25 एवं 2024-26, बीएड सत्र 2023-25 और पीएचडी के विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं. कुल 6,415 विद्यार्थियों को डिग्री मिलनी थी, जबकि दीक्षांत समारोह के लिए 3,535 विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया था. इनमें 1,834 यूजी और 1,701 पीजी विद्यार्थी शामिल हैं.

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समारोह में विद्यार्थियों के साथ राज्यपाल

 

समारोह की शुरुआत राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और विश्वविद्यालय के कुलगीत के साथ हुई. इसके बाद राज्यपाल संतोष कुमार गांगवार ने दीप प्रज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया. अतिथियों का पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न देकर स्वागत किया गया. इस अवसर पर राज्यपाल ने डीएसपीएमयू की नई वेबसाइट का उद्घाटन भी किया.

 

समारोह में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य डॉ. राकेश मोहन विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए. उन्हें समारोह में मानद उपाधि प्रदान की गई. उन्होंने विद्यार्थियों को दीक्षांत संबोधन भी दिया.

 

स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में विभिन्न संकायों के विद्यार्थियों को बेहतर प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया. पीजी सत्र 2023-25 में विज्ञान संकाय से नेहा गोरुंग (गणित), सामाजिक विज्ञान से प्रेम ठाकुर (समाजशास्त्र), मानविकी से शुभम कुमार पांडेय (संस्कृत), वाणिज्य से एकता कुमारी (अकाउंट्स) और प्रोफेशनल कोर्स से विभा रानी (कंप्यूटर एप्लीकेशन) का नाम शामिल है.

 

पीजी सत्र 2024-26 में विज्ञान संकाय से सिमरन कुमारी (गणित), सामाजिक विज्ञान से आयुष राज (मनोविज्ञान), मानविकी से सौम्या कुमारी आर्या (संस्कृत), वाणिज्य से सूर्या कुमारी (अकाउंट्स) और प्रोफेशनल कोर्स में आयुषी कुमारी और जन्नत नूर (बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन) ने सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया.

 

यूजी वर्ग में विज्ञान से लवली कुमारी (गणित), सामाजिक विज्ञान से प्रिया कुमारी (भूगोल), मानविकी से तनु कुमारी सिंह (संस्कृत), वाणिज्य से शुभकाम्ना सिंह (बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन) और प्रोफेशनल कोर्स से अमृता कुमारी तिवारी (कंप्यूटर एप्लीकेशन) का नाम स्वर्ण पदक सूची में शामिल है.

 

राज्यपाल बोले- ज्ञान केवल जानकारी का संचय नहीं

मुख्य अतिथि राज्यपाल संतोष कुमार गांगवार ने उपाधि एवं पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को बधाई दी. उन्होंने विद्यार्थियों के माता-पिता, परिवारजनों और शिक्षकों को भी बधाई दी, जिनके मार्गदर्शन, परिश्रम और विश्वास से यह उपलब्धि संभव हुई.

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संबोधित करते राज्यपाल

 

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने विद्यार्थियों को ज्ञान और दृष्टि प्रदान की है. अब इस ज्ञान का उपयोग किस दिशा में करना है, यह उनके निर्णय और कर्म पर निर्भर करेगा.

 

राज्यपाल ने भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का उल्लेख करते हुए “विद्या ददाति विनयम्” का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि सच्ची विद्या व्यक्ति को विनम्रता, विवेक और संस्कार प्रदान करती है. उन्होंने नालंदा महाविहार का उल्लेख करते हुए कहा कि इस महान शिक्षा केंद्र ने भारत की ज्ञान परंपरा को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया और देश-विदेश के विद्यार्थियों एवं विद्वानों को आकर्षित किया.

 

उन्होंने सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री हेनसांग का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने नालंदा में अध्ययन किया था और अपने यात्रा-वृत्तांत में वहां की विकसित शैक्षणिक व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय महत्व का उल्लेख किया. राज्यपाल ने कहा कि नालंदा में प्रवेश सहज नहीं था. प्रवेश-द्वार पर विद्वान द्वार-पंडित अभ्यर्थियों की विद्वत्ता और तर्कशक्ति की परीक्षा लेते थे.

 

उन्होंने कहा कि इसका संदेश स्पष्ट है कि ज्ञान केवल जानकारी का संचय नहीं, बल्कि प्रश्न करने, तर्क करने, संवाद करने और सत्य की खोज करने की सतत प्रक्रिया है. भारत को अपनी गौरवशाली ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और नवाचार के साथ जोड़ते हुए वैश्विक ज्ञान-शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत करना चाहिए. इसमें युवा पीढ़ी की महत्वपूर्ण भूमिका है.

 

राज्यपाल ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि वे केवल शिक्षाविद् और राजनेता ही नहीं, बल्कि एक विचारशील राष्ट्रनिर्माता थे. कम आयु में विश्वविद्यालय के कुलपति का दायित्व संभालना उनकी प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता का परिचायक था.

 

उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम से जुड़े विश्वविद्यालय का विद्यार्थी होना उस परंपरा से जुड़ना है, जो ज्ञान के साथ साहस, विचार के साथ विवेक और अधिकार के साथ कर्तव्य की भावना को महत्व देती है. उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे जीवन में जहां भी जाएं, अपने आचरण और कर्म से विश्वविद्यालय की गरिमा बनाए रखें.

 

राज्यपाल ने वर्तमान तकनीकी बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, जैव-प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष विज्ञान और स्वचालन जीवन और कार्यक्षेत्र की प्रकृति बदल रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमें तकनीक के केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके विकास और रचनात्मक उपयोग में योगदान देने वाला समाज बनना है.

 

उन्होंने कहा कि तकनीक को मनुष्य ने बनाया है, न कि तकनीक ने मनुष्य को. इसलिए किसी भी तकनीक का उपयोग मानव जीवन और समाज के हित में विवेकपूर्ण एवं रचनात्मक ढंग से होना चाहिए.

 

उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संभावित अवसरों के साथ इससे जुड़े जोखिमों और चुनौतियों पर भी वैज्ञानिक एवं तकनीकी जगत में गंभीर मंथन हो रहा है. ऐसे समय में तकनीकी प्रगति को मानवीय संवेदनशीलता, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ना जरूरी है.

 

राज्यपाल ने कहा कि दीक्षांत समारोह में 142 स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में 93 छात्राएं हैं. उन्होंने इसे बदलते भारत की प्रेरक तस्वीर बताया. उन्होंने कहा कि बेटियां शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, चिकित्सा, प्रौद्योगिकी, खेल और अनेक क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं.

 

उन्होंने विश्वविद्यालय की छात्राओं से अपनी क्षमताओं को पहचानने, आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने और उत्कृष्टता के नए मानदंड स्थापित करने की अपील की. उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे.

 

राज्यपाल ने कहा कि कई विद्यार्थी आगे उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे, कुछ सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में कार्य करेंगे और कुछ व्यवसाय, उद्यमिता या स्टार्टअप की दिशा में आगे बढ़ेंगे. उन्होंने विद्यार्थियों से अपने भविष्य को केवल नौकरी प्राप्त करने तक सीमित नहीं रखने और जहां संभव हो, रोजगार प्राप्त करने के साथ रोजगार सृजन की सोच और क्षमता विकसित करने का आग्रह किया.

 

उन्होंने कहा कि सफलता के साथ चुनौतियां भी आएंगी. ऐसी परिस्थिति में निराश नहीं होना चाहिए. किसी एक परीक्षा या किसी एक असफलता को जीवन का अंतिम निर्णय नहीं मानना चाहिए. असफलता रुकने का संकेत नहीं, बल्कि समझने, सुधारने और अधिक तैयारी के साथ आगे बढ़ने का अवसर है. सफलता मिलने पर विनम्र और कठिन समय में धैर्यवान बने रहने की सलाह उन्होंने दी.

 

राज्यपाल ने कहा कि भारत आज नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है और विकसित भारत@2047 का संकल्प देश के सामने है. उन्होंने 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में भारत की अध्यक्षता में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह वैश्विक मंच पर भारत की सक्रिय और सार्थक भूमिका को दर्शाता है.

 

उन्होंने कहा कि आज के विद्यार्थी ही 2047 के भारत के महत्वपूर्ण निर्माणकर्ता होंगे. इसलिए विद्यार्थियों के सपने केवल व्यक्तिगत भविष्य तक सीमित नहीं होने चाहिए. उनकी सफलता में समाज की प्रगति, राष्ट्र की उन्नति और विश्व में भारत की प्रतिष्ठा को और मजबूत करने का संकल्प भी होना चाहिए.

 

अंत में राज्यपाल ने विद्यार्थियों से आत्मचिंतन करने को कहा कि “मैंने क्या पाया?” के साथ-साथ “मैंने समाज को क्या दिया?”. उन्होंने सभी उपाधि एवं पदक प्राप्त विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की और कहा कि वे जहां भी जाएं, अपने विश्वविद्यालय और परिवार का नाम रोशन करें तथा अपने ज्ञान, क्षमता और कर्म से समाज और राष्ट्र के निर्माण में सार्थक योगदान दें.

 

कुलपति ने कहा- ज्ञान के साथ चरित्र और विनम्रता जरूरी

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. राजीव मनोहर ने समारोह में राज्यपाल संतोष कुमार गांगवार, डॉ. राकेश मोहन, विशिष्ट अतिथियों, विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों, कर्मचारियों, अभिभावकों, मीडिया प्रतिनिधियों और उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का अभिनंदन किया. उन्होंने विशेष रूप से राज्यपाल का स्वागत करते हुए उनके सार्वजनिक जीवन में सेवा, समर्पण, संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठा तथा शिक्षा और समाज के उत्थान के प्रति प्रतिबद्धता का उल्लेख किया.

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राकेश मोहन 

 

कुलपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों के वर्षों के अध्ययन, अनुशासन और परिश्रम की परिणति है. यह माता-पिता के सपनों और त्याग का परिणाम तथा शिक्षकों के समर्पण की स्वीकृति है. उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय एक ज्ञान परंपरा का नाम है. विश्वविद्यालय के रूप में भले ही यह अभी शैशवावस्था से निकलकर किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक यात्रा लंबी और गौरवपूर्ण है.

 

उन्होंने कहा कि समय के साथ विश्वविद्यालय की संरचना और स्वरूप बदला, लेकिन ज्ञान के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता कभी नहीं बदली. उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते” का उल्लेख करते हुए कहा कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है.

 

कुलपति ने बताया कि शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप मार्च माह से अब तक करीब आठ सेमेस्टर परीक्षाएं पूरी की गईं और 2024 सत्र की परीक्षा का परिणाम 10 दिन में प्रकाशित किया गया. उनके संबोधन में 641 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान किए जाने का भी उल्लेख किया गया.

 

उन्होंने बताया कि वर्तमान सत्र में विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा लगभग 344 शोध पत्र और 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की गई हैं. विश्वविद्यालय को लगभग 40 परियोजनाएं प्राप्त हुई हैं.

 

इसके अलावा 100 से अधिक संगोष्ठियों और विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया. उन्होंने कहा कि युवा शोधकर्ताओं और विभागों की उत्कृष्ट उपलब्धियों को प्रोत्साहित करने के लिए दो माह पहले ‘पुण्य’ और ‘उत्कृष्ट’ जैसी योजनाओं की शुरुआत की गई है.

 

कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय का प्रयास है कि वह समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान करे. सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई, जनजातीय और स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टि से समझना तथा स्थानीय समस्याओं के समाधान विकसित करना विश्वविद्यालय की प्राथमिकताओं में शामिल है.

 

विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अब तक विश्वविद्यालय विद्यार्थियों के सामने प्रश्न रखता था और वे उनके उत्तर देते थे. अब जीवन विद्यार्थियों के सामने प्रश्न रखेगा और उन्हें अपने निर्णयों, कर्मों और चरित्र से उन प्रश्नों के उत्तर देने होंगे.

 

उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे जीवन में जहां भी जाएं, उत्कृष्टता को आदत बनाएं, लेकिन विनम्रता को कभी पीछे न छोड़ें. सफलता हासिल करें, लेकिन यह भी सुनिश्चित करें कि उनकी सफलता सार्थक हो. उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों का ज्ञान किसी समस्या का समाधान दे और उनकी प्रतिभा किसी युवा को प्रेरित करे.

 

कुलपति ने कहा, “ज्ञान आपको सामर्थ्य देगा, लेकिन चरित्र आपको दिशा देगा.” उन्होंने विद्यार्थियों से सीखते रहने और यह स्वीकार करने का साहस रखने को कहा कि सीखने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है.

 

उन्होंने कहा कि किसी विश्वविद्यालय की वास्तविक प्रतिष्ठा उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि उसके शिक्षकों की बौद्धिक प्रतिबद्धता से मापी जाती है. उन्होंने सभी शिक्षकों और कर्मचारियों के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त की, जिनके प्रयासों से यह सम्मान संभव हो सका.

 

कुलपति ने कहा कि विद्यार्थी आज विश्वविद्यालय से केवल उपाधि लेकर नहीं जा रहे हैं, बल्कि इसकी परंपरा, प्रतिष्ठा और अपेक्षाओं को भी अपने साथ ले जा रहे हैं. आने वाले वर्षों में उनकी उपलब्धियां विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पहचान बनेंगी. उन्होंने विद्यार्थियों के उज्ज्वल, सफल और सार्थक भविष्य की कामना की.

 

डॉ. राकेश मोहन ने कहा- सीखना कभी बंद नहीं होता

विशिष्ट अतिथि डॉ. राकेश मोहन ने उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों और अतिथियों को बधाई दी. उन्होंने विद्यार्थियों की सफलता में माता-पिता के त्याग और शिक्षकों के मार्गदर्शन की सराहना की.

 

उन्होंने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि जीवन में एक बड़े बदलाव का अवसर है. उन्होंने विद्यार्थियों को निरंतर सीखते रहने की सलाह देते हुए कहा कि सीखना कभी बंद नहीं होता और अब से विद्यार्थी स्वयं अपने शिक्षक हैं.

 

डॉ. राकेश मोहन ने कहा कि कॉलेज की शिक्षा स्पष्ट रूप से लिखने, पढ़ने, समझने और समस्याओं का समाधान करने जैसी बुनियादी क्षमताएं विकसित करती है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी ये मौलिक क्षमताएं जरूरी बनी रहेंगी.

 

उन्होंने अपने करियर का उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी पहली डिग्री इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में थी, लेकिन बाद में वे कानून और अर्थशास्त्र की ओर बढ़े. इसके बाद उन्होंने मौद्रिक नीति और वित्तीय विनियमन के क्षेत्र में काम किया. उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि जीवन और करियर में सीखने तथा आगे बढ़ने के लिए रास्ते बदलना भी संभव है.

 

उन्होंने कहा कि पिछले 35 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने औसतन 6.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि की है. उन्होंने स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर बच्चों, विशेषकर लड़कियों की पहुंच में हुए ऐतिहासिक सुधार का भी उल्लेख किया.

 

उन्होंने ग्रामीण भारत में 60 हजार निर्वाचित प्रतिनिधियों और 3.3 लाख महिला स्वयं सहायता समूहों, जिनमें करीब 59 लाख महिलाएं शामिल हैं, के माध्यम से आए सामाजिक बदलाव का जिक्र किया. संचार तकनीक में बदलाव का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब वे 1964 में 16 वर्ष की उम्र में लंदन गए थे, तब 1964 से 1971 के बीच केवल एक बार घर आ सके थे.

 

उन्होंने विद्यार्थियों से समाज, निजी क्षेत्र और सरकार के साथ मिलकर योगदान देने की सलाह दी. साथ ही अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने और केवल पेशेवर लक्ष्यों के पीछे भागने के बजाय अर्थपूर्ण जीवन जीने तथा रिश्तों को बनाए रखने पर जोर दिया.

 

डॉ. राकेश मोहन ने कहा कि आज मिली डिग्री अब तक सीखे गए ज्ञान को प्रमाणित करती है, लेकिन आगे का सफर निरंतर जिज्ञासा और जिम्मेदारी के साथ तय करना होगा.

 

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