Search

Advertisement
Advertisement
Advertisement

वर्ल्ड बैंक के फैसले से बढ़ी चिंता, जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए संसाधनों की होगी कमी

टिप्पणी
  • गर्मी, बाढ़, समुद्री तूफानों और अनियमित वर्षा बड़ी चुनौती

Ranchi :  जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता को लेकर नई बहस छिड़ गई है. इसकी वजह वर्ल्ड बैंक का वह निर्णय है, जिसमें उसने अपने कुल वार्षिक ऋण का 45 प्रतिशत हिस्सा जलवायु संबंधी परियोजनाओं पर खर्च करने का निर्धारित लक्ष्य वापस ले लिया है. यह लक्ष्य वर्ष 2023 में दुबई में आयोजित COP28 सम्मेलन के दौरान तय किया गया था.

 

हालांकि वर्ल्ड बैंक ने स्पष्ट किया है कि वह विकासशील देशों को जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) उपलब्ध कराना जारी रखेगा. साथ ही उसकी क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान भी प्रभावी रहेगी और जलवायु वित्त से जुड़ी रिपोर्टिंग पहले की तरह जारी रहेगी. अंतर केवल इतना है कि अब 45 प्रतिशत खर्च का अनिवार्य लक्ष्य लागू नहीं होगा.

 

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब वैश्विक समुदाय ने COP29 में वर्ष 2035 तक हर साल कम से कम 1.3 ट्रिलियन डॉलर जलवायु वित्त जुटाने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने में वर्ल्ड बैंक जैसे बहुपक्षीय विकास बैंकों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. वर्ष 2024 में सभी बहुपक्षीय विकास बैंकों ने मिलकर 137 अरब डॉलर का रिकॉर्ड जलवायु वित्त उपलब्ध कराया था, जिसमें सबसे बड़ा योगदान वर्ल्ड बैंक का था.

 

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का सबसे अधिक असर उन परियोजनाओं पर पड़ सकता है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल समाज और बुनियादी ढांचे को तैयार करने से जुड़ी है. इनमें बाढ़ सुरक्षा, शहरी क्षेत्रों को भीषण गर्मी से बचाने की योजनाएं, सूखा-रोधी कृषि और तटीय इलाकों की सुरक्षा जैसे कार्य शामिल हैं. ऐसे प्रोजेक्ट आमतौर पर निजी निवेशकों को आकर्षित नहीं करते और इनके लिए रियायती व दीर्घकालिक वित्त की जरूरत होती है.

 

भारत के संदर्भ में भी इस निर्णय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. भारत वर्ल्ड बैंक समूह से सबसे अधिक ऋण लेने वाले देशों में शामिल है. हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा जैसी परियोजनाओं के लिए अब निजी और वैकल्पिक निवेश के स्रोत बढ़े हैं, लेकिन जलवायु अनुकूलन से जुड़ी योजनाओं में वर्ल्ड बैंक की रियायती वित्तीय सहायता अभी भी अहम भूमिका निभाती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में निवेश घटता है, तो जलवायु जोखिमों से जूझ रहे समुदायों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है.

 

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी इस निर्णय पर चिंता जताई है. उनका कहना है कि विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु अनुकूलन दोनों क्षेत्रों में बड़े निवेश की आवश्यकता है. ऐसे समय में तय लक्ष्य हटने से कमजोर देशों के लिए वित्तीय सहायता जुटाना और चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

 

वर्ल्ड बैंक का कहना है कि अब उसका फोकस केवल खर्च के प्रतिशत पर नहीं, बल्कि वास्तविक परिणामों पर रहेगा. बैंक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, जलवायु जोखिमों के प्रति समुदायों की क्षमता बढ़ाने और अन्य प्रभावों का आकलन जारी रखेगा. साथ ही अपनी जलवायु कार्ययोजना की स्वतंत्र समीक्षा भी कराएगा.


फिर भी इस फैसले ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है. जब दुनिया जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों भीषण गर्मी, बाढ़, समुद्री तूफानों और अनियमित वर्षा का सामना कर रही है, तब जलवायु अनुकूलन के लिए पर्याप्त और सुलभ वित्त उपलब्ध कराना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है. ऐसे में सबसे बड़ी चिंता उन विकासशील देशों और कमजोर समुदायों की है, जिन्हें जलवायु संकट का सबसे अधिक सामना करना पड़ रहा है.

 

 

Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही