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लेखिका डॉ रोज केरकेट्टा का झारखंड आंदोलन में था महत्वपूर्ण योगदान: रेणु

एसडीसी सभागार में शुक्रवार को संवाद द्वारा लेखिका, कवयित्री और साहित्यकार डॉ. रोज केरकेट्टा की जयंती मनाई गई. कार्यक्रम की शुरुआत उनके चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित कर की गई.
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Ranchi : एसडीसी सभागार में शुक्रवार को संवाद द्वारा लेखिका, कवयित्री और साहित्यकार डॉ. रोज केरकेट्टा की जयंती मनाई गई. कार्यक्रम की शुरुआत उनके चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित कर की गई. सबसे पहले उनकी बेटी वंदना केरकेट्टा ने पुष्प अर्पित एवं नमन किए. 

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डोरंडा कॉलेज की प्रोफेसर आलम आरा ने नागपुरी गीतों के माध्यम से रोज केरकेट्टा के जीवन, संघर्ष और साहित्यिक योगदान को जीवंत कर दिया. कार्यक्रम में डॉ. केरकेट्टा के जीवन पर आधारित आधे घंटे की साक्षात्कार फिल्म भी प्रदर्शित की गई, जिसे लोगों ने भावुक होकर देखा.

 

रोज सिर्फ महिला नहीं, एक युग थीं— प्रो.रेणु दीवान

रांची विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर रेणु दीवान ने कहा कि रोज केरकेट्टा का जन्म 5 दिसम्बर 1940 को सिमडेगा में हुआ था. वे खड़िया समुदाय से थी. रोज केरकेट्टा सिर्फ महिला नहीं, बल्कि एक सशक्त लेखक और साहित्यकार थीं.

 

उन्होंने गरीबी, सामाजिक उत्पीड़न और महिलाओं की पीड़ा को अपनी लेखनी के केंद्र में रखा. उनके साहित्य में आदिवासी समाज, खासकर लड़कियों के संघर्ष और प्रतिरोध की सशक्त आवाज मिलती है. झारखंड आंदोलन में भी उनका योगदान रहा है.

 

रोज केरकेट्टा स्त्री शिक्षा को हथियार मानती थी- सावित्री बड़ाईक

प्रोफेसर सावित्री बड़ाईक ने कहा कि रोज केरकेट्टा की कहानियां स्त्री संघर्ष, रिश्तों की गहराई और समाज की विसंगतियों को उजागर करती हैं. वे आदिवासी समाज के साथ-साथ सभी समुदाय की महिलाओं के बारे में सोचती थीं.

 

साहित्कार रोज केरकेट्टा शंख और स्वर्णरेखा नदी की तरह थीं. वह लगातार संघर्ष करती गई और आगे बढ़ती गईं. रोज केरकेट्टा स्त्री शिक्षा को हथियार मानती थीं और महिलाओं को हुनर के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थीं.  इस अवसर पर साहित्यकार वंदना केरकेट्टा, मांती कुमारी, पूर्णिमा बिरूली, सुनिता बिरूली, पार्वती देवी, ऐनी टुडु समेत अन्य शामिल थे.

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