- 43 मामलों में जांच पूरी होने के बाद भी कैबिनेट स्तर पर अनुमति का इंतजार
- 43 में से 23 फाइलें दिसंबर 2025 से पहले से लंबित हैं
- प्रारंभिक जांच सामान्यतः तीन महीने के भीतर पूरी की जाए : हाईकोर्ट
- यदि जांच की अवधि बढ़ाने की आवश्यकता हो, तो एसीबी प्रमुख विस्तार दे सकेंगे
- ऐसी स्थिति में जांच को छह महीने के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाना चाहिए
Ranchi : एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) में 216 प्रारंभिक जांच (पीई) लंबित हैं. जिसपर हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एसीबी को कड़े दिशा-निर्देश जारी किये हैं. प्रारंभिक जांच पूरी होने के बाद भी फाइलों को बिना निर्णय के लंबे समय तक लंबित रखने पर रोक लगाने के उद्देश्य से अदालत ने स्पष्ट समयसीमा तय की है.
हाईकोर्ट के समक्ष राज्य सरकार की ओर से दाखिल रिपोर्ट के अनुसार, एसीबी में कुल 216 प्रारंभिक जांच लंबित हैं. इनमें से 43 मामलों में जांच पूरी हो चुकी है. लेकिन प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति या आगे के आदेश के लिए फाइलें कैबिनेट व संबंधित मंत्री स्तर पर लंबित हैं. इन 43 मामलों में 23 फाइलें दिसंबर 2025 से पहले से लंबित हैं.
वहीं, शेष 173 मामलों में एसीबी स्तर पर ही प्रारंभिक जांच जारी है. अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि कई प्रारंभिक जांच एक दशक से भी अधिक समय से लंबित हैं. यह गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि राज्य सरकार के अपने दिशा-निर्देशों में प्रारंभिक जांच तीन महीने में पूरी करने का प्रावधान है.
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छह माह से अधिक जांच लंबित रखने पर लिखित कारण देना होगा
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि प्रारंभिक जांच सामान्यतः तीन महीने के भीतर पूरी की जाए. यदि जांच की अवधि बढ़ाने की आवश्यकता हो, तो एसीबी प्रमुख विस्तार दे सकेंगे. हालांकि जांच को छह महीने के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाना चाहिए. यदि किसी मामले में छह महीने से अधिक समय लगता है, तो एसीबी प्रमुख को देरी के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे. साथ ही आगे की अवधि भी स्पष्ट करनी होगी और समय-समय पर जांच की समीक्षा करनी होगी.
अदालत ने यह भी कहा कि जांच की अवधि बढ़ाने का कारण संबंधित फाइल में दर्ज होना चाहिए. सक्षम प्राधिकारी इन कारणों की समीक्षा करेंगे. संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए जाने की स्थिति में कानून के तहत जितनी जानकारी साझा की जा सकती है, उतनी जानकारी उसे भी उपलब्ध कराई जाएगी.
जांच पूरी होने के बाद तीन महीने में लेना होगा फैसला
हाईकोर्ट ने उन मामलों के संबंध में भी समयसीमा निर्धारित की है, जिनमें प्रारंभिक जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति या आगे की कार्रवाई के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास फाइल लंबित है. अदालत ने निर्देश दिया कि कैबिनेट, कैबिनेट निगरानी विभाग व संबंधित सक्षम प्राधिकारी को ऐसी फाइल मिलने के तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा. यदि अतिरिक्त समय की आवश्यकता हो, तो लिखित कारण दर्ज कर एक महीने का और समय लिया जा सकेगा.
पुरानी लंबित जांचों पर भी लागू होगा आदेश
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पहले से लंबित प्रारंभिक जांचों का भी इसी व्यवस्था के तहत निपटारा करना होगा. ऐसी जांच, जो अभी एसीबी स्तर पर लंबित हैं, उन्हें आदेश की तारीख से छह महीने के भीतर पूरा करना होगा. इसके बाद जांच जारी रखने के लिए एसीबी प्रमुख को उचित कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार समीक्षा करनी होगी. वहीं, जांच पूरी होने के बाद अनुमति या आदेश की प्रतीक्षा कर रही फाइलों पर सक्षम प्राधिकारी को तीन महीने में निर्णय लेना होगा. उचित कारण दर्ज कर एक महीने का अतिरिक्त समय लिया जा सकेगा.
छह महीने बाद हाईकोर्ट में देनी होगी रिपोर्ट
अदालत ने एसीबी के महानिदेशक को निर्देश दिया कि फैसले की तारीख से छह महीने पूरे होने पर हाईकोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करें. इस रिपोर्ट में प्रत्येक लंबित प्रारंभिक जांच के संबंध में आवश्यक जानकारी देनी होगी. बताना होगा कि प्रारंभिक जांच किस तारीख को शुरू हुई थी, जांच पूरी हुई है या अभी लंबित है, जांच पूरी होने पर फाइल सक्षम प्राधिकारी को भेजी गई है या नहीं, प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति दी गई है या नहीं, मामले को बंद करने व आगे की कार्रवाई के संबंध में कोई आदेश पारित हुआ है या नहीं. अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में प्रत्येक मामले की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि लंबित जांचों में हुई प्रगति का आकलन किया जा सके.
जांच में देरी से प्रभावित होता है निष्पक्ष न्याय का अधिकार
खंडपीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच में अनुचित और अत्यधिक देरी से आपराधिक न्याय व्यवस्था प्रभावित होती है. ऐसी स्थिति में गंभीर अपराधों में शामिल लोग कार्रवाई से बच सकते हैं. दूसरी ओर, जिन व्यक्तियों के खिलाफ प्रारंभिक जांच लंबित रहती है, उन्हें भी लंबे समय तक अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है, इससे उनके सेवाकाल, सतर्कता मंजूरी और प्रतिष्ठा पर असर पड़ सकता है.
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के आरोपों की उचित जांच होनी चाहिए, ताकि दोषियों को कानून के अनुसार जवाबदेह बनाया जा सके. कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को बिना पर्याप्त कारण के वर्षों तक प्रारंभिक जांच की तलवार के नीचे नहीं रखा जा सकता. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सार्वजनिक हित और संबंधित व्यक्तियों के त्वरित न्याय के अधिकार के बीच संतुलन आवश्यक है.
कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों की प्रारंभिक जांच में वर्षों की देरी पर गंभीर चिंता जताते हुए राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) को जांच समयबद्ध तरीके से पूरी करने का निर्देश दिया है. अदालत ने कहा कि प्रारंभिक जांच को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता. सामान्य परिस्थितियों में जांच तीन महीने में पूरी होनी चाहिए. यदि जांच छह महीने से अधिक समय तक लंबित रहती है, तो एसीबी प्रमुख को इसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे और समय-समय पर इसकी समीक्षा करनी होगी.
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने इससे संबंधित जनहित याचिका पर यह आदेश दिया. अदालत ने राज्य सरकार को लंबित प्रारंभिक जांच के मामलों में निर्धारित समयसीमा के अनुसार कार्रवाई करने और छह महीने बाद विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. खंडपीठ ने जनहित याचिका का निष्पादन करते हुए राज्य सरकार और एसीबी को निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा. अदालत ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और एसीबी के महानिदेशक को फैसले की प्रति उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया है.


