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करम पर्व पर शिल्पी नेहा तिर्की बोलीं- करम की डाल प्रकृति, पुरखा और मनुष्य के संवाद का प्रतीक

Ranchi News : कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि करम पर्व केवल झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि कई आदिवासी राज्यों में भी इसे मनाया जाता है. उन्होंने कहा कि मानव और प्रकृति के बीच सदियों से गहरा संबंध रहा है. करम की डाल को केवल पेड़ की शाखा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह प्रकृति, पुरखा और मनुष्य के बीच संवाद का प्रतीक है.
 
करमा पूजा में शामिल कृषि मंत्री
  • करम पूजा महोत्सव में गूंजे 9 भाषाओं के लोकगीत

Ranchi News : रांची विश्वविद्यालय के डॉ. रामदयाल मुंडा अखड़ा में मंगलवार को जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने करम पूजा महोत्सव मनाया. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की शामिल हुईं. इस दौरान जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के विद्यार्थियों ने पारंपरिक लोकगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं.

 

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कार्यक्रम में पांच जनजातीय भाषाओं मुंडारी, कुड़ुख, संथाली, हो और खड़िया के विद्यार्थियों ने वाद्ययंत्र के साथ लोकगीत प्रस्तुत किए. वहीं, क्षेत्रीय भाषाओं नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया और कुरमाली के विद्यार्थी भी कार्यक्रम में शामिल हुए.

 

खड़िया भाषा के विद्यार्थियों ने अतिथियों का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया. भाषा विभाग के विद्यार्थियों ने अतिथियों को जावा फूल भेंट स्वरूप दिया. कार्यक्रम की शुरुआत कुरमाली भाषा के शोधार्थियों की प्रस्तुति से हुई.

 

करम की डाल प्रकृति, पुरखा और मनुष्य के संवाद का प्रतीक : शिल्पी

कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि करम पर्व केवल झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि कई आदिवासी राज्यों में भी इसे मनाया जाता है. उन्होंने कहा कि मानव और प्रकृति के बीच सदियों से गहरा संबंध रहा है. करम की डाल को केवल पेड़ की शाखा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह प्रकृति, पुरखा और मनुष्य के बीच संवाद का प्रतीक है.

 

उन्होंने कहा कि करम परंपरा को केवल धर्म से जोड़कर देखने के बजाय इसे पुरखों से चली आ रही परंपरा के वाहक के रूप में समझने की जरूरत है. आदिवासी समाज को केवल गरीबी या लाभार्थी के नजरिए से देखने के बजाय उसकी जीवनशैली और पारंपरिक ज्ञान से सीखने की जरूरत है.

 

आदिवासी संस्कृति को सिर्फ नाच-गाने तक सीमित न करें

मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि आदिवासी समाज को समझने में अक्सर गलती की जाती हैं. उनके नाच-गान को केवल मनोरंजन के रूप में देखा जाता है, जबकि इसके पीछे वर्षों पुराने सामाजिक और प्रकृति के साथ संवाद की परंपरा है. उन्होंने कहा कि देश में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय रहते हैं और उनकी पहचान और पारंपरिक ज्ञान को व्यापक स्तर पर सामने लाने की जरूरत है.

 

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के पारंपरिक ज्ञान को देश-दुनिया तक पहुंचाने की आवश्यकता है. भाषा और संस्कृति के संरक्षण के माध्यम से समाज की पहचान को मजबूत किया जा सकता है.

 

प्रकृति और आदिवासी समाज का गहरा संबंध : कुलपति

कुलपति सरोज शर्मा ने कहा कि प्रकृति और आदिवासी समाज के बीच गहरा संबंध है. आज पंचतत्व प्रदूषित हो रहे हैं. ऐसे आयोजनों के माध्यम से प्रकृति और समाज के बीच संबंध को फिर से समझने का अवसर मिलता है.

 

उन्होंने कहा कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय अपने आप में अनूठा विभाग है. देश में कई राज्य हैं, लेकिन इस तरह का विभाग कहीं और नहीं है. इस परंपरा को आगे की पीढ़ियों तक ले जाने की जरूरत है. आदिवासी समाज आधुनिक समाज है और प्रकृति की पूजा के माध्यम से वह प्रकृति के साथ अपने संबंध को कायम रखता है.

 

कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं है, बल्कि समाज और सरकार को आईना दिखाने का काम भी करना है. पारंपरिक ज्ञान, भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने में विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका है.


अखड़ा में एक साथ दिखी झारखंड की विविध संस्कृति

करम महोत्सव में पूर्व कुड़ुख विभागाध्यक्ष डॉ हरि उरांव, सथाली विभागाध्यक्ष डॉ प्रेम मुर्मु, मुंडारी विभागाध्यक्ष बिरेंद्र सोय, कुड़ुख विभागाध्यक्ष डॉ बंदे उरांव, पद्म श्री मधु मंसुरी हसमुख समेत अन्य शामिल थे.

 

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