Ranchi Court News : झारखंड हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी से करीब 36 वर्ष पुराने कथित अतिरिक्त वेतन की वसूली नहीं की जा सकती, खासकर तब जब उसके खिलाफ विधि सम्मत प्रक्रिया में कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं हुआ हो.
कोर्ट ने कहा कि केवल फर्जीवाड़े का आरोप लगाकर किसी कर्मचारी के वेतन या अन्य संपत्ति संबंधी अधिकार को नहीं छीना जा सकता. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर यह फैसला सुनाया.
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को मुख्य रूप से बरकरार रखा. हालांकि, एकल पीठ द्वारा संबंधित कर्मचारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने पर लगाई गई रोक को खंडपीठ ने हटा दिया. साथ ही याचिका निष्पादित कर दी.
एफआईआर पर रोक का आदेश हटाया
हाईकोर्ट ने एकल पीठ द्वारा वेतन की वसूली रोकने और सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने के आदेश को बरकरार रखा. लेकिन एफआईआर दर्ज करने पर रोक लगाने वाले हिस्से को खारिज कर दिया. खंडपीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक कृत्य के आरोप में एफआईआर दर्ज करने से कानून स्वयं नहीं रोकता.
एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी को आपराधिक न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष और साक्ष्य रखने का पूरा अवसर मिलता है. कोर्ट ने कहा कि जामताड़ा थाना कांड संख्या 337/2013 और दुमका थाना कांड संख्या 220/2014 यदि अभी लंबित हैं, तो राज्य सरकार उन्हें कानून के अनुसार आगे बढ़ा सकती है.
1975 में ट्रेसर पद पर हुई थी नियुक्ति
मामले के अनुसार, तारकेश्वर प्रसाद सिंह की नियुक्ति 13 जनवरी 1975 को ट्रेसर के पद पर हुई थी. फरवरी 1980 में उन्हें अस्थायी रूप से जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर प्रोन्नति दी गई. बाद में इस प्रोन्नति को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ और वर्ष 1986 में उन्हें पुनः ट्रेसर पद पर वापस कर दिया गया. हालांकि, वर्ष 1987 में पूर्व आदेश वापस लिए जाने के बाद उन्हें जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर पुनः बहाल कर दिया गया और उनकी नियुक्ति को स्थायी भी कर दिया गया. उन्हें बाद में एसीपी का लाभ भी मिला.
विभागीय जांच में पहले ही मिल चुकी थी दंड
वर्ष 2011 में तारकेश्वर प्रसाद सिंह को निलंबित कर उनके खिलाफ 14 आरोप लगाए गए थे. इनमें जूनियर अकाउंट्स क्लर्क का पद कथित रूप से अवैध तरीके से रखने और उस पद का वेतन लेने का आरोप भी शामिल था. विभागीय जांच के बाद कुछ आरोप प्रमाणित पाए गए और उन्हें निंदा (Censure) व दो वेतन वृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकने की सजा दी गई.
2013 और 2014 में दर्ज हुई थी दो एफआईआर
विभाग ने बाद में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्णय लिया. इसके परिणामस्वरूप जामताड़ा थाना कांड संख्या 337/2013 और दुमका थाना कांड संख्या 220/2014 दर्ज हुए. तारकेश्वर प्रसाद सिंह 31 जुलाई 2013 को सेवानिवृत्त हो गए. इसके बाद वर्ष 2016 में विभाग ने 1986 के पुराने आदेश को फिर से प्रभावी करते हुए उनकी सभी प्रोन्नतियां रद्द कर दी और ट्रेसर पद के वेतन से अधिक प्राप्त राशि की वसूली का आदेश जारी कर दिया.
हाईकोर्ट ने कहा-36 साल बाद वसूली उचित नहीं
खंडपीठ ने पाया कि जिस अतिरिक्त वेतन की वसूली का आदेश 21 अप्रैल 2016 को दिया गया, वह राशि वर्ष 1980 से जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर मिलने वाले वेतन से संबंधित थी. यानी कथित अतिरिक्त भुगतान के 36 वर्ष से अधिक समय बाद वसूली का आदेश दिया गया.
खंडपीठ ने कहा कि झारखंड पेंशन नियम, 2000 के नियम 43(बी) में सेवानिवृत्त कर्मचारी से राशि की वसूली के लिए स्पष्ट व्यवस्था है. यदि सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय कार्रवाई शुरू करनी हो तो निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा का पालन करना आवश्यक है.
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद नियम 43(बी) के तहत कोई कार्यवाही शुरू नहीं की गई. विभागीय जांच में भी यह निष्कर्ष दर्ज नहीं हुआ कि वह अवैध रूप से जूनियर अकाउंट्स क्लर्क का पद धारण करने का दोषी था.
एक ही आरोप पर दोहरी सजा भी उचित नहीं
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि जूनियर अकाउंट्स क्लर्क का पद अवैध रूप से धारण करने के आरोप को लेकर पहले ही विभागीय जांच हो चुकी थी और कर्मचारी को सजा भी दी जा चुकी थी. ऐसे में उसी आरोप के आधार पर दोबारा दंडात्मक कार्रवाई करना डबल जियोपर्डी (Double Jeopardy) के सिद्धांत से प्रभावित होगा.
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