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UCIL की महिला कर्मी की बर्खास्तगी बरकरार, HC ने श्रम न्यायाधिकरण का आदेश किया रद्द

Ranchi news : अदालत ने कहा कि कर्मचारी ने बर्न्ट लाइम की रासायनिक जांच के परिणामों में हेरफेर कर कंपनी को आर्थिक नुकसान पहुंचाया था. ऐसे गंभीर कदाचार के मामले में बर्खास्तगी की सजा को असंगत नहीं कहा जा सकता.
 
हाईकोर्ट
  • बर्न्ट लाइम की जांच रिपोर्ट में 60-65 फीसदी नमूनों के परिणाम बदलकर सप्लायर को पहुंचाया था आर्थिक लाभ
  • हाईकोर्ट ने कहा- गंभीर कदाचार में बर्खास्तगी अनुचित नहीं

Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल), जादूगोड़ा की महिला कर्मचारी टी नायक की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है. हाईकोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, धनबाद के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला कर्मचारी की बर्खास्तगी को अवैध बताते हुए सेवा में बहाल करने और पूरे बकाया वेतन सहित अन्य वित्तीय लाभ देने का निर्देश दिया गया था. 

 

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अदालत ने कहा कि कर्मचारी ने बर्न्ट लाइम की रासायनिक जांच के परिणामों में हेरफेर कर कंपनी को आर्थिक नुकसान पहुंचाया था. ऐसे गंभीर कदाचार के मामले में बर्खास्तगी की सजा को असंगत नहीं कहा जा सकता.

 

यूसीआईएल ने न्यायाधिकरण के 21 जनवरी 2015 के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.  मामले के अनुसार, थानुश्री नायक कंपनी में साइंटिफिक असिस्टेंट ग्रेड-1 के पद पर कार्यरत थीं. उन्हें प्रयोगशाला में बर्न्ट लाइम के रासायनिक विश्लेषण की रिपोर्ट तैयार कर सहायक अधीक्षक को भेजने की जिम्मेदारी दी गयी थी. 

 

जांच के दौरान पता चला कि तीन दिसंबर 2007 से 18 अप्रैल 2008 के बीच उन्होंने बर्न्ट लाइम के करीब 60 से 65 फीसदी नमूनों की वास्तविक जांच रिपोर्ट में हेरफेर कर कैल्शियम ऑक्साइड (CaO) की मात्रा अधिक दर्शायी थी.

 

बर्न्ट लाइम की गुणवत्ता के आधार पर ही कंपनी सप्लायर को भुगतान करती थी. आरोप था कि रिपोर्ट में गड़बड़ी कर खराब गुणवत्ता का बर्न्ट लाइम आपूर्ति करने वाले सप्लायर मेसर्स श्याम केमिकल्स को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाया गया और कंपनी को नुकसान हुआ.

 

शुरुआत में कर्मचारी ने स्वीकार की थी गड़बड़ी

अदालत ने पाया कि 28 अप्रैल 2008 को स्पष्टीकरण मांगे जाने पर महिला कर्मचारी ने अपने जवाब में बर्न्ट लाइम के परिणामों में हेरफेर करने की बात स्वीकार की थी. उसने अपनी गलती के लिए माफी मांगते हुए पूर्व के सेवा रिकॉर्ड को देखते हुए राहत देने की अपील की थी.

 

दो मई 2008 को एक अन्य पत्र में उसने बताया था कि सप्लायर ने उससे व्यक्तिगत रूप से मिलकर परिणामों को बदलकर अधिक दिखाने का अनुरोध किया था.

 

हालांकि, आरोप पत्र जारी होने के बाद 19 मई 2008 को दिए गये जवाब में कर्मचारी ने आरोपों से इनकार किया. उसने दावा किया कि सहायक अधीक्षक ने दबाव और डर दिखाकर उससे दोनों पत्र लिखवाये थे. विभागीय जांच में इस दलील को स्वीकार नहीं किया गया.

 

जांच अधिकारी ने दस्तावेजों और गवाहों के बयान के आधार पर छह आरोपों को प्रमाणित पाया. इसके बाद अनुशासनिक प्राधिकार ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया. अपीलीय प्राधिकार ने भी बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा.

 

श्रम न्यायाधिकरण ने बहाली का दिया था आदेश

महिला कर्मचारी की ओर से औद्योगिक विवाद उठाये जाने पर केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, धनबाद ने छह मार्च 2014 को विभागीय जांच को निष्पक्ष और उचित माना था. इसके बावजूद 21 जनवरी 2015 के अवार्ड में न्यायाधिकरण ने कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द कर दी थी.

 

न्यायाधिकरण का मानना था कि कर्मचारी के स्वीकारोक्ति वाले दोनों पत्र दबाव में लिखवाये गये प्रतीत होते हैं. साथ ही, कंपनी को हुए वास्तविक नुकसान का ठोस प्रमाण नहीं है. न्यायाधिकरण ने सभी छह आरोपों को अप्रमाणित बताते हुए कर्मचारी को पूर्ण बकाया वेतन और अन्य वित्तीय लाभ के साथ सेवा में बहाल करने का आदेश दिया था.

 

न्यायाधिकरण ने साक्ष्यों को गलत तरीके से समझा

हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण के फैसले को त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा कि विभागीय जांच को निष्पक्ष और उचित मान लेने के बाद भी न्यायाधिकरण ने जांच अधिकारी के निष्कर्षों को खारिज करने का कोई ठोस आधार नहीं बताया. कर्मचारी ने शुरुआती दोनों पत्रों को दबाव में लिखवाये जाने का आरोप लगाया था, लेकिन जांच अधिकारी ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस दलील को खारिज कर दिया था.

 

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 11-ए के तहत न्यायाधिकरण को विभागीय जांच में प्रस्तुत साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करने का अधिकार है, लेकिन उसे इस अधिकार का इस्तेमाल न्यायिक विवेक के साथ करना होगा. जांच अधिकारी के निष्कर्षों में स्पष्ट विकृति या सजा के अत्यधिक असंगत होने की स्थिति में ही हस्तक्षेप किया जा सकता है. न्यायाधिकरण केवल अपीलीय अदालत की तरह विभागीय जांच के निष्कर्षों को नहीं पलट सकता.

 

अदालत ने कहा कि इस मामले में विभागीय जांच निष्पक्ष थी और जांच अधिकारी के निष्कर्ष उपलब्ध दस्तावेजों एवं गवाहों के बयानों पर आधारित थे. कंपनी के रासायनिक जांच परिणामों में हेरफेर कर सप्लायर को आर्थिक लाभ पहुंचाने का आरोप गंभीर था. इसलिए बर्खास्तगी की सजा को अत्यधिक या असंगत नहीं माना जा सकता.

 

हाईकोर्ट ने औद्योगिक न्यायाधिकरण के 21 जनवरी 2015 के अवार्ड को रद्द करते हुए यूसीआईएल द्वारा पारित बर्खास्तगी के आदेश को बहाल कर दिया और कंपनी की रिट याचिका स्वीकार कर ली.

 

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