Ranchi News : झारखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली जांच एजेंसी एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) में एक दशक हो जाने के बाद भी पांच पूर्व मंत्रियों सहित कई हाईप्रोफाइल मामलों की फाइलों पर धूल जमती जा रही हैं.. जानकारी के अनुसार, ACB के पास 216 प्रारंभिक जांच से जुड़े मामले लंबित हैं. इनमें 43 मामलों की जांच पूरी होने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति या आगे की कार्रवाई के लिए फाइलें संबंधित स्तर पर अटकी पड़ी हैं.
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वहीं, 173 मामलों में ACB स्तर पर ही प्रारंभिक जांच जारी है. झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता पंकज यादव के अनुसार, उनके द्वारा उठाए गए भ्रष्टाचार से संबंधित करीब 12 मामले ACB में लंबित हैं.
गौरतलब है कि कुछ दिन पहले झारखंड हाईकोर्ट ने ACB में लंबित मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार की जांच एजेंसी को फटकार लगाई थी. अदालत ने छह महीने के अंदर सभी लंबित मामलों का निष्पादन करने का निर्देश दिया है. साथ ही कहा है कि जिन मामलों का निष्पादन निर्धारित समय सीमा में नहीं हो पाता है, उनमें देरी के कारण भी स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाएं.
पांच पूर्व मंत्रियों की संपत्ति जांच, 2023 में मिली थी अनुमति
रघुवर दास सरकार के पांच पूर्व मंत्रियों अमर कुमार बाउरी, रणधीर कुमार सिंह, डॉ. नीरा यादव, नीलकंठ सिंह मुंडा और लुईस मरांडी के खिलाफ कथित आय से अधिक संपत्ति की जांच का मामला ACB के चर्चित मामलों में शामिल है. सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कुमार यादव ने 2014 और 2019 के चुनावी हलफनामों में संपत्ति की कथित वृद्धि को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. 25 जुलाई 2023 को राज्य मंत्रिपरिषद ने पांचों के खिलाफ प्रारंभिक जांच की अनुमति दी थी. अब जांच की प्रगति और निष्कर्ष को लेकर सवाल हैं.
RINPAS भर्ती मामला: 14 लोगों पर प्राथमिकी
रांची स्थित RINPAS में कथित नियुक्ति अनियमितताओं को लेकर सितंबर 2016 में ACB ने दो पूर्व मंत्रियों के अलावा तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव बी.के. त्रिपाठी, संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. अमूल रंजन समेत करीब 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी. आरोप नियुक्तियों में योग्यता संबंधी नियमों की अनदेखी और वेतन वृद्धि में अनियमितता से जुड़े थे.
महगामा जलापूर्ति योजना: अतिरिक्त भुगतान का आरोप
गोड्डा की महगामा ग्रामीण जलापूर्ति योजना में कथित वित्तीय अनियमितता का मामला भी ACB की जांच से जुड़ा रहा है. करीब 1.64 करोड़ रुपये की योजना में लगभग 70 लाख रुपये के अतिरिक्त भुगतान का आरोप लगा था. मामले में 12 इंजीनियरों और एक ठेकेदार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की खबर सामने आई थी.
आय से अधिक संपत्ति मामला: चार्जशीट में देरी
IAS विनय कुमार चौबे के खिलाफ शराब घोटाले सहित आय से अधिक संपत्ति के आरोप में नवंबर 2025 में ACB ने प्राथमिकी दर्ज की थी. मामले में संपत्ति, बैंक लेन-देन और निवेश की जांच की गई. मार्च 2026 में आरोपपत्र निर्धारित समय में दाखिल नहीं होने के कारण उन्हें डिफॉल्ट बेल मिलने की रिपोर्ट आई.
नमकुम जमीन घोटाला, रिकॉर्ड गायब करने का आरोप
रांची के नामकुम अंचल के डुंडू क्षेत्र में जमीन के दाखिल-खारिज और सरकारी दस्तावेज गायब होने के मामले में झारखंड हाईकोर्ट के निर्देश पर ACB ने जांच शुरू की. आरोप है कि शिकायतकर्ता के परिवार की जमीन के एक हिस्से पर प्रकाश कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड के नाम जमाबंदी खोल दी गई.
जांच के दौरान तत्कालीन अंचलाधिकारी डॉ. श्वेता वर्मा, राजस्व निरीक्षक मनोज कुमार और कार्यालय लिपिक दीपक कुमार के खिलाफ अगस्त 2026 में प्राथमिकी दर्ज की गई. मामला कथित अवैध म्यूटेशन और राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर से जुड़ा है. इस मामले में अभी तक दो से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है.
रिम्स जमीन घोटाला, सरकारी जमीन की खरीद-बिक्री
झारखंड में सबसे बड़े सरकारी अस्पताल RIMS की अधिग्रहित जमीन पर कथित कब्जे और फर्जी दस्तावेजों के जरिए खरीद-बिक्री के मामले में ACB ने जनवरी 2026 में प्राथमिकी दर्ज की थी. जांच में मोरहाबादी और कोकर की जमीन से जुड़े मामले सामने आए. अप्रैल में चार आरोपितों को गिरफ्तार किया गया, जबकि जून 2026 में बिल्डर शुभम साबू की गिरफ्तारी हुई. जुलाई में ACB ने चार आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल की. मामले में सरकारी जमीन के रिकॉर्ड, रजिस्ट्री, म्यूटेशन और निर्माण की अनुमति में कथित अनियमितताओं की जांच की जा रही है.
रामेश्वर उरांव ने भी विधानसभा में उठाए थे कार्यशैली पर सवाल
इधर, कुछ साल पहले झारखंड के पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव ने विधानसभा में ACB की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे. उन्होंने एजेंसी के कामकाज को लेकर टिप्पणी की थी, उन्होंने कहा था कि एसीबी में अब तीन तरह से काम हो रहा है, किसी को फंसा दो, किसी को दबा दो और किसी को उबार दो. मैं भी इससे पहले आईपीएस रह चुका हूं. और ऐसे में उन पर सवाल खड़े किए जा रहे हो रहे हैं.
कानून में 90 दिनों की समय-सीमा, फिर भी वर्षों से लंबित जांच
झारखंड कैबिनेट निगरानी अधिसूचना, 2015 के क्लॉज 21(4)(viii) के तहत प्रारंभिक जांच को सामान्य तौर पर 90 दिनों के भीतर पूरा करने का प्रावधान बताया गया है. जांच की अवधि बढ़ाने की स्थिति में निर्धारित प्रक्रिया का पालन और सक्षम अधिकारी के आदेश के तहत कारण दर्ज करना जरूरी है. लंबित जांचों की समय-समय पर समीक्षा का भी प्रावधान है.
इसके बावजूद हाईकोर्ट के सामने ऐसे मामले आए, जिनमें प्रारंभिक जांच वर्षों से लंबित थी. इससे सवाल उठता है कि जब समय-सीमा पहले से निर्धारित थी, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ. क्या लंबित मामलों की नियमित समीक्षा की गई? क्या जांच बढ़ाने के कारण रिकॉर्ड पर दर्ज किए गए? और जांच पूरी होने के बाद अनुमति के लिए फाइलें कितने समय तक लंबित रहीं?
इन सवालों का जवाब प्रत्येक मामले की फाइल और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही सामने आ सकता है. लेकिन अदालत के निर्देश के बाद अब लंबित जांचों की स्थिति स्पष्ट करना और उन्हें समय-सीमा में पूरा करना ACB तथा संबंधित सरकारी प्राधिकारियों की जिम्मेदारी होगी.
वर्षों तक जांच लंबित रखना अधिकारों का उल्लंघन, हाईकोर्ट ने जताई चिंता
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय का अधिकार केवल अदालत में चलने वाले मुकदमों तक सीमित नहीं है. जांच एजेंसियों की प्रारंभिक जांच भी उचित समय-सीमा के भीतर पूरी होनी चाहिए.
किसी लोकसेवक या व्यक्ति के खिलाफ जांच वर्षों तक लंबित रहने से उसके करियर, पदोन्नति, पेंशन और सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. किसी व्यक्ति के सिर पर अनिश्चितकाल तक जांच की तलवार लटकाए रखना उचित नहीं है.
दूसरी ओर, भ्रष्टाचार के मामलों में देरी से साक्ष्य प्रभावित होने और आरोपों की जांच कमजोर पड़ने की आशंका भी रहती है. इसलिए जांच एजेंसी को न केवल निष्पक्षता बनाए रखनी है, बल्कि समय पर निष्कर्ष तक भी पहुंचना है.
अब छह महीने में तय होगा लंबित फाइलों का भविष्य
हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति मुख्य सचिव, गृह सचिव और ACB के महानिदेशक को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है. साथ ही वर्षों से लंबित प्रारंभिक जांचों को आदेश की तारीख से छह महीने के भीतर पूरा करने की समय-सीमा तय की है.
जिन मामलों में जांच पूरी होने के बाद सरकार, कैबिनेट या संबंधित विभाग की अनुमति का इंतजार है, उनमें सक्षम प्राधिकारी को भी समय पर निर्णय लेना होगा. इससे उन मामलों में आगे की कानूनी कार्रवाई का रास्ता साफ हो सकता है, जिनमें जांच पूरी होने के बाद फाइलें अनुमति के इंतजार में अटकी हुई हैं.
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