- मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मधु कोड़ा के चार्ज में बदलाव पर HC ने नहीं किया हस्तक्षेप
Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में आरोप में संशोधन की मांग वाली पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की याचिका पर अपने आदेश में निचली अदालत को आदेश उचित बताया है. हाईकोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है.
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अदालत ने स्पष्ट किया कि मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अपराध से अर्जित संपत्ति की अंतिम राशि का निर्धारण ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा. मधु कोड़ा ने पीएमएलए के विशेष न्यायाधीश, रांची की अदालत द्वारा 29 अप्रैल 2023 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
निचली अदालत ने आरोप में संशोधन की उनकी अर्जी पर यह कहते हुए निर्णय लिया था कि मुकदमे की आवश्यकता के अनुसार उचित चरण पर आरोप में बदलाव किया जा सकता है. हाईकोर्ट ने फैसले में मधु कोड़ा की याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया.
आरोप में बताई गई राशि पर उठाया था सवाल
मधु कोड़ा की ओर से दलील दी गई थी कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में समय-समय पर आरोप में बदलाव कराया, लेकिन उनके खिलाफ बताई गई अपराध से अर्जित संपत्ति की राशि में कोई बदलाव नहीं हुआ.
उनका कहना था कि आरोप स्पष्ट नहीं हैं और अभियोजन पक्ष ने आरोपों के समर्थन में आवश्यक आधारभूत तथ्यों को साबित नहीं किया है. ऐसे में आरोप में संशोधन जरूरी है, ताकि उन्हें अपना बचाव करने का उचित अवसर मिल सके.
मामले में 25 सितंबर 2012 को पहली बार आरोप तय किया गया था. उस समय अपराध से अर्जित संपत्ति की कुल राशि 3549.72 करोड़ रुपये और 24,29,990 अमेरिकी डॉलर बताई गई थी. मधु कोड़ा के संबंध में संपत्ति में निवेश के जरिए 1340 करोड़ रुपये और 12,14,995 अमेरिकी डॉलर की राशि का उल्लेख किया गया था.
इसके बाद 17 सितंबर 2013 को आरोप में संशोधन कर रुपये की राशि बढ़ाकर 3554,65,16,240 रुपये कर दी गई. 13 जून 2018 को फिर संशोधन हुआ और यह राशि बढ़कर 3633,11,16,240 रुपये हो गई. हालांकि, मधु कोड़ा के खिलाफ बताई गई राशि में बदलाव नहीं हुआ. इसी आधार पर उन्होंने आरोप में संशोधन की मांग की थी.
मूल मामले में ट्रायल जारी, बरी नहीं हुए हैं मधु कोड़ा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले का मूल अपराध झारखंड के निगरानी थाना कांड संख्या 09/2009 से जुड़ा है. बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने 11 अगस्त 2010 को इसकी जांच अपने हाथ में लेकर आरसी 05(A)/2010-AHD-R के रूप में मामला दर्ज किया.
सीबीआई ने इस मामले में आरोपपत्र और अंतिम आरोपपत्र दाखिल किया है. मूल मामले में मधु कोड़ा न तो बरी हुए हैं और न ही उनके खिलाफ मामला निरस्त किया गया है. मुकदमे का ट्रायल जारी है.
अदालत ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में अपराध से अर्जित संपत्ति की राशि और मूल अपराध से संबंधित आरोपपत्र में दर्ज राशि के बीच अंकगणितीय समानता होना अनिवार्य नहीं है. अंतिम रूप से कितनी राशि का अपराध से अर्जित संपत्ति के रूप में प्रमाण मिलता है, यह ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के मूल्यांकन का विषय है. इस पर आरोप में संशोधन की अर्जी पर विचार करते समय अंतिम निर्णय नहीं किया जा सकता.
आरोप में बदलाव करना अदालत का अधिकार
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 216 के तहत आरोप में बदलाव या संशोधन करने की शक्ति अदालत में निहित है. किसी पक्षकार को केवल आवेदन दाखिल करने के आधार पर आरोप में संशोधन कराने का अधिकार नहीं मिल जाता.
अदालत ने यह भी कहा कि धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है. इन शक्तियों का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना और न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति करना है. मौजूदा मामले में निचली अदालत के आदेश में ऐसी कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि या गंभीर अनियमितता नहीं मिली, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जा सके.
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