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1974 से लंबित भूमि विवाद में हाईकोर्ट का फैसला, राजस्थान भवन ट्रस्ट की अपील खारिज

झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1974 से लंबित भूमि विवाद मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राजस्थान भवन ट्रस्ट की अपील खारिज कर दी है. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक एवं जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने अपने निर्णय में निचली अदालत और एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखा है.
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  • निचली अदालत और एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखा

Ranchi :  झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1974 से लंबित भूमि विवाद मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राजस्थान भवन ट्रस्ट की अपील खारिज कर दी है. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक एवं जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने अपने निर्णय में निचली अदालत और एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखा है. 

 

खंडपीठ ने पाया कि विवादित जमीन पलामू जिले में स्थित थी, इसलिए उसका पंजीकरण वहीं होना चाहिए था. लेकिन रांची में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए मात्र 200 रुपये में मेसरा (रांची) की 10 डिसमिल जमीन का दिखावटी लेन-देन किया गया, ताकि पूरी बिक्री विलेख (सेल डीड) रांची जिला अवर निबंधक कार्यालय में पंजीकृत कराई जा सके.

 

निचली अदालत और एकलपीठ ने इसे धोखाधड़ी मानते हुए बिक्री विलेख को अवैध करार दिया था. खंडपीठ ने भी इस निष्कर्ष से सहमति जताई और कहा कि “धोखाधड़ी हर गंभीर कृत्य को निष्प्रभावी कर देती है.”

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नोटिस देने का दावा साबित नहीं

ट्रस्ट की ओर से यह दलील दी गई कि वादियों को बिक्री से पहले रजिस्टर्ड नोटिस भेजा गया था. लेकिन ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने गवाहों के बयान के आधार पर पाया कि ऐसा कोई नोटिस वास्तव में तामील नहीं हुआ था. हाईकोर्ट ने इन तथ्यों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. 

 

इस मामले में पहले हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 में अपील स्वीकार कर ली थी. लेकिन वादियों की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में वह निर्णय रद्द कर मामला दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था.

 

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि बिक्री विलेख धोखाधड़ीपूर्ण था, पंजीकरण प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ और 1961 के समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया गया. खंडपीठ ने एलपीए (अपील) को खारिज करते हुए पूर्व के निर्णयों को बरकरार रखा.

 

जानें क्या है मामला

दरअसल मामला वर्ष 1971 में की गई एक बिक्री विलेख (सेल डीड) से जुड़ा है. राजस्थान भवन ट्रस्ट ने पलामू (अब लातेहार) जिले के चंदवा स्थित लगभग 2.24 एकड़ जमीन को खरीदने का दावा किया था. यह जमीन लाल त्रिबेणी नाथ शाहदेव और लाल राजेंद्र नाथ शाहदेव के परिवार की संयुक्त संपत्ति थी. 

 

वादियों का आरोप था कि उनके भाई लाल फणिंद्र नाथ शाहदेव ने 16 दिसंबर 1961 को हुए एक पंजीकृत समझौते का उल्लंघन करते हुए बिना उन्हें खरीद का पहला अवसर दिए 19 अप्रैल 1971 को यह जमीन ट्रस्ट के नाम बेच दी. 

 

मामले में हाईकोर्ट में अपीलकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि वादियों ने केवल घोषणा (डिक्लेरेशन) की मांग की, कब्जा वापसी की नहीं, इसलिए यह वाद धारा 34, विशिष्ट राहत अधिनियम 1963 के तहत बाधित है.

 

खंडपीठ ने कहा कि जब वादी पहले से ही कब्जे में हों, तो केवल घोषणा की मांग करना ही पर्याप्त है और अतिरिक्त राहत की आवश्यक नहीं है.

 

 

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