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झारखंड का Health System कितना हाईटेक? स्ट्रेचर नहीं, एंबुलेंस बेपटरी, संक्रमित खून व इलाज के इंतजार में मौत

Ranchi News : JHALSA की निरीक्षण रिपोर्ट ने RIMS परिसर की एक और तस्वीर सामने रखी. रिपोर्ट के मुताबिक पुराने इमरजेंसी गेट के पास मंदिर और 10-20 दुकानें थीं, जबकि OPD के पास बड़ी संख्या में ठेले लगे थे.
 
प्रतीकात्मक चित्र

Ranchi News : झारखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था को आधुनिक और बेहतर बनाने के दावे लगातार होते हैं, लेकिन अस्पतालों की जमीन पर तस्वीर कई बार इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आती है. कहीं मरीज को समय पर एंबुलेंस नहीं मिलती, कहीं इमरजेंसी में स्ट्रेचर को लेकर सवाल उठते हैं, तो कहीं सरकारी अस्पताल के ब्लड बैंक से थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को HIV संक्रमित खून चढ़ाने का गंभीर मामला सामने आ चुका है. राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल RIMS की व्यवस्था पर खुद हाईकोर्ट को दखल देना पड़ा है.

 

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108 Ambulance पर सवाल, इलाज के रास्ते में छात्रा की मौत

जुलाई 2026 में 108 एंबुलेंस सेवा को लेकर सरकार को बड़ा फैसला लेना पड़ा. स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने खराब सेवाओं की शिकायतों के बीच सभी 108 एंबुलेंस के संचालन की जिम्मेदारी अस्थायी तौर पर सिविल सर्जनों को देने की घोषणा की. इसी दौरान गुमला की 15 वर्षीय छात्रा के परिवार ने आरोप लगाया कि एंबुलेंस सेवा में देरी और इलाज तक पहुंचने में हुई देरी ने उसकी मौत में भूमिका निभाई.

 

मंत्री ने मौजूदा एजेंसी के खिलाफ FIR की बात भी कही. यानी जिस व्यवस्था का काम गंभीर मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाना है, वही व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में आ गई.

 

MGM में स्ट्रेचर का इंतजार, मरीज की मौत का आरोप

22 अगस्त 2026 को जमशेदपुर के MGM Medical College and Hospital में 38 वर्षीय विक्की सिंह की मौत का मामला सामने आया. परिजनों के मुताबिक, गंभीर सीने के दर्द के बाद मरीज को ऑटो से अस्पताल लाया गया, लेकिन इमरजेंसी तक पहुंचाने के लिए करीब 25 मिनट तक स्ट्रेचर नहीं मिला.

 

स्ट्रेचर मिलने तक मरीज ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया और डॉक्टरों ने उसे brought dead घोषित किया. अस्पताल अधीक्षक ने स्ट्रेचर की कमी से इनकार करते हुए कहा कि उस समय मरीजों की भारी भीड़ थी और करीब 50 स्ट्रेचर उपलब्ध थे. उन्होंने घटना की परिस्थितियों की जांच की बात कही.

 

सवाल यह है कि अगर स्ट्रेचर उपलब्ध थे, तो गंभीर मरीज को इमरजेंसी तक पहुंचने में इतनी देर क्यों हुई?

 

RIMS में मरीज की मौत के बाद डॉक्टरों ने काम रोका

सितंबर की शुरुआत में RIMS में इलाज के दौरान एक गंभीर मरीज की मौत के बाद परिजनों द्वारा ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया. RIMS Junior Doctors Association के अनुसार, मरीज गंभीर pancreatitis की हालत में भर्ती हुआ था.

 

मौत के बाद परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए डॉक्टरों पर हमला किया. विरोध में रेजिडेंट डॉक्टरों ने करीब दो घंटे काम बंद रखा. बाद में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के आश्वासन के बाद काम शुरू हुआ.

 

इसके कुछ दिन बाद जूनियर डॉक्टरों ने अस्पताल परिसर में Quick Action Force बनाने और बाहरी लोगों की एंट्री नियंत्रित करने की मांग की.

यानी राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में मरीज और डॉक्टर दोनों ही व्यवस्था की सुरक्षा को लेकर सवाल उठा रहे हैं.

 

चाईबासा में HIV संक्रमित खून का मामला

झारखंड के स्वास्थ्य तंत्र पर सबसे गंभीर सवालों में से एक चाईबासा सदर अस्पताल का मामला है. 2025 में थैलेसीमिया से पीड़ित पांच बच्चों को कथित तौर पर HIV संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने का मामला सामने आया. अप्रैल 2026 में झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में सरकार से जिम्मेदार मेडिकल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट मांगी. कोर्ट को बताया गया कि मामले में FIR दर्ज की गई है. जांच में यह भी सामने आया कि अस्पताल का ब्लड बैंक 2008 में लाइसेंस समाप्त होने के बावजूद संचालित हो रहा था.

 

यह सिर्फ एक अस्पताल की गलती का मामला नहीं है. यह सवाल उठाता है कि रक्त की जांच, ब्लड बैंक की निगरानी और लाइसेंस व्यवस्था कितनी प्रभावी है.

 

RIMS की व्यवस्था पर हाईकोर्ट की नजर

RIMS की स्थिति को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने भी गंभीरता दिखाई. अदालत ने अस्पताल में पेयजल, मशीनों, उपकरणों, दवाओं की उपलब्धता, मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की जरूरत, सफाई और चिकित्सा उपकरणों की कार्यक्षमता जैसे मुद्दों की जांच के लिए निरीक्षण का आदेश दिया था. याचिका में खाली पदों और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी की बात भी सामने रखी गई थी.

 

JHALSA की निरीक्षण रिपोर्ट ने RIMS परिसर की एक और तस्वीर सामने रखी. रिपोर्ट के मुताबिक पुराने इमरजेंसी गेट के पास मंदिर और 10-20 दुकानें थीं, जबकि OPD के पास बड़ी संख्या में ठेले लगे थे. रिपोर्ट में कहा गया कि इन अतिक्रमणों से एंबुलेंस की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और आपात स्थिति में यह मरीजों के लिए life threat बन सकता है. रिपोर्ट में RIMS की जमीन पर बड़ी संख्या में अवैध निर्माण और अतिक्रमण का भी उल्लेख है.

 

सिर्फ RIMS नहीं, जिला अस्पताल भी सवालों में

मई 2026 में सरायकेला-खरसावां के राजनगर Community Health Centre में एक आदिवासी स्वास्थ्यकर्मी और उसके नवजात बच्चे की मौत का मामला सामने आया. परिवार ने आरोप लगाया कि बिजली नहीं होने के कारण डिलीवरी मोबाइल फोन की रोशनी में कराई गई और समय पर उचित इलाज या रेफरल नहीं मिला. सरकार ने जांच समिति बनाई. हालांकि शुरुआती जांच में महिला की मौत postpartum haemorrhage और बच्चे की मौत umbilical cord से choking से होने की बात सामने आई थी. इसलिए इस मामले में अंतिम जिम्मेदारी तय होने से पहले जांच रिपोर्ट जरूरी है.

 

इलाज से पहले सिस्टम की परीक्षा

इन घटनाओं को एक साथ देखें तो सवाल सिर्फ डॉक्टर या अस्पताल पर नहीं, बल्कि पूरे health delivery system पर उठता है.

 

एंबुलेंस सेवा में शिकायतें हैं.
इमरजेंसी में स्ट्रेचर को लेकर विवाद है.
RIMS में सुरक्षा और अतिक्रमण का सवाल है.
दवाओं और उपकरणों की उपलब्धता पर हाईकोर्ट को निरीक्षण कराना पड़ रहा है.
ब्लड बैंक का लाइसेंस वर्षों पहले खत्म होने के बावजूद संचालन का गंभीर मामला सामने आया.
ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में बिजली, विशेषज्ञ डॉक्टर और समय पर रेफरल जैसी बुनियादी सुविधाओं पर भी सवाल उठते रहे हैं.

 

ऐसे में हाईटेक Health System का दावा जमीन पर कितनी दूर तक पहुंचा है, इसका जवाब मशीनों, नई बिल्डिंगों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि उस मरीज से मिलना चाहिए जिसे इमरजेंसी में समय पर स्ट्रेचर चाहिए, उस परिवार से मिलना चाहिए जिसे समय पर एंबुलेंस चाहिए और उस बच्चे से जिसकी जिंदगी सुरक्षित रक्त पर निर्भर है.

 

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