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झारखंड में 2014 से नवंबर 2023 तक बिना स्वीकृति आदेश के ही 83,878 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ

  • बिना स्वीकृति आदेश के आवंटन पर महालेखाकार और सरकार के बीच मदभेद.
  • फंड Release का यह मामला कुल 10,060 लेखा शीर्षों से संबंधित है.

Ranchi: राज्य में बिना स्वीकृति आदेश के ही 83,878.41 करोड़ रुपये आवंटित किया गया. वित्त विभाग के Integrated Financial Managenment System (IFMS) से मिले आंकड़ों का विश्लेषण के बाद महालेखाकार ने इस बात का खुलासा किया है. हालांकि इस मुद्दे पर महालेखाकार और सरकार के बीच मदभेद है. महालेखाकार इसे नियम सम्मत नहीं मानता है. सरकार इसे व्यावहारिक मानती है.

 

राज्य में लागू वित्त नियमावली और ट्रेजरी कोर्ड के प्रावधानों के तहत किसी भी मद में खर्च करने के लिए नियम बना हुआ है. इसमें विधानसभा से अनुदान मांग स्वीकृत होने के बाद उसे खर्च करने के लिए स्वीकृति आदेश जारी करने से लेकर खर्च करने तक की प्रक्रिया है. 

 

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इस निर्धारित प्रक्रिया के तहत विभाग का अनुदान मांग विभाग से स्वीकृत होने के बद उसे उसी काम में खर्च करने की स्वीकृति दी जाती है. इसके बाद इसके बाद इससे संबंधित स्वीकृति आदेश (Sanction Order) जारी किया जाता है. स्वीकृति आदेश (Sanction Order) के बाद ही उस काम पर खर्च करने के लिए आवंटन आदेश जारी किया जाता है.

 

फंड उपलब्ध होने के बाद निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी (DDO) द्वारा ट्रेजरी के माध्यम से उस मद पर खर्च किया जाता है. स्वीकृति आदेश से लेकर खर्च करने तक की निर्धारित प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए वित्त विभाग के नियंत्रण में Integrated Financial Managenment System (IFMS) लागू है. 

 

इसे भी जानें...

 

राज्य में स्वीकृति आदेश से लेकर खर्च करने तक की प्रक्रिया नियमानुसार हो रही है या नहीं. इस बात की जांच के लिए महालेखाकार ने वित्त विभाग के IFMS और ट्रेजरी से मिले आंकड़ो का मिलान कर विश्लेषण किया. इसमें यह पाया कि वर्ष 2014-15 से नवंबर 2023 तक की अवधि में स्वीकृति आदेश के बिना ही 83,878.41 करोड़ का आवंटन आदेश जारी कर दिया गया. फंड Release का यह मामला कुल 10,060 लेखा शीर्षों (Number Of Heads Of Account) से संबंधित है.

 

बिना स्वीकृति आदेश के ही आवंटन आदेश जारी करने के मामले में राज्य सरकार और महालेखाकार के बीच गहरा मतभेद है. राज्य सरकार का मानना है कि कई योजनाएं ऐसी होती हैं जिसे पूरा करने में एक साल से अधिक समय लगता है. ऐसी योजनों को पूरा करने के लिए हर साल स्वीकृति आदेश जारी करने की जरूरत नहीं है. क्योंकि पहली बार ही जारी किये जाने वाले स्वीकृति आदेश में यह लिखा रहता है कि योजना तीन साल में पूरी होगी. इसलिए दूसरे और तीसरे वित्तीय वर्ष के दौरान उस योजना पर खर्च करने के लिए नये सिरे से स्वीकृति आदेश जारी करने की जरूरत नहीं है.

 

इसे भी समझें...

 

महालेखाकार और सरकार के बीच के विवाद को इस उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है. जैसे सरकार ने 600 करोड़ की लागत से विधानसभा के निर्माण की योजना बनायी. इस योजना को तीन साल में पूरा करना है. विधानसभा की योजना को शुरू करने के लिए आवश्यक प्रक्रिया पूरा कर स्वीकृति आदेश जारी किया गया. इसमें राशि का उल्लेख है. 

 

एक साल काम होने के बाद दूसरे साल विधानसभा का काम जारी रखने के लिए नये सिरे से स्वीकृति आदेश जारी करने की जरूरत नहीं है. दूसरे और तीसरे साल सिर्फ आवंटन आदेश जारी होगा. इसी मुद्दे पर महालेखाकार का यह मानना है कि इस योजना के लिए हर साल स्वीकृति और आवंटन आदेश जारी करना चाहिए.

 

बिना स्वीकृति आदेश के ही आवंटन आदेश का ब्योरा (करोड़ में)

वित्तीय वर्ष  शीर्ष की संख्या  स्वीकृति आदेश  आवंटित राशि 
2014-15  03  00  0.035
2015-16  02  00  0.95
2017-18  03  00  1046.48
2018-19  02  00  615.97
2020-21 33  00  75.67
2021-22  5311  00  49535.56
2022-23  4707  00  32603.69

 

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