Ranchi : जेल का नाम सुनते ही आमतौर पर लोगों के मन में ऐसी जगह की तस्वीर उभरती है, जहां अपराधी कानून के शिकंजे में रहते हैं और समाज से पूरी तरह कटकर अपनी सजा भुगतते हैं. लेकिन झारखंड की जेलों को लेकर समय-समय पर सामने आने वाले आरोप और घटनाएं एक अलग ही कहानी बयां करते हैं.
Lagatar News पिछले दो दिनों से झारखंड की जेल व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है. पहली रिपोर्ट में ''जेलों के भीतर बंद कैदियों और उनके परिजनों से कथित अवैध वसूली के आरोपों'' को सामने लाया गया था.
वहीं दूसरी रिपोर्ट में सवाल उठाया गया था कि ''झारखंड की जेलों में पैसों वालों का राज''. आखिर कैसे कुछ प्रभावशाली अपराधियों, गैंगस्टरों और नक्सलियों को जेल के भीतर कथित तौर पर वीआईपी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं''
अब इस श्रृंखला की तीसरी रिपोर्ट में सबसे गंभीर सवाल यह है कि झारखंड की कुछ जेलों में बंद अपराधी सलाखों के पीछे रहकर भी बाहर अपना नेटवर्क संचालित कर रहे हैं?
वर्षों से उठते रहे हैं सवाल
झारखंड की विभिन्न जेलों को लेकर लंबे समय से तरह-तरह की चर्चाएं और आरोप सामने आते रहे हैं. राज्य की कई जेलों में कुख्यात अपराधी, गैंगस्टर और नक्सली बंद हैं. इनमें अमन साहू गिरोह के सदस्य, अमन श्रीवास्तव, विकास तिवारी, अखिलेश सिंह, सुजीत सिन्हा, हरि तिवारी समेत कई अन्य अपराधियों और विभिन्न नक्सली संगठनों से जुड़े लोगों के नाम समय-समय पर चर्चाओं में आते रहे हैं. रांची के होटवार केंद्रीय कारागार, मेदिनीनगर, हजारीबाग, धनबाद, दुमका, लातेहार और जमशेदपुर की जेलों को लेकर भी वर्षों से सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी को लेकर सवाल उठते रहे हैं.
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डीजीपी ने भी जताई थी चिंता
11 मार्च 2025 को तत्कालीन डीजीपी अनुराग गुप्ता ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि राज्य में संगठित अपराध की कई घटनाओं के पीछे जेल में बंद गैंगस्टरों का नेटवर्क सक्रिय है. उन्होंने अमन साहू, अमन श्रीवास्तव और विकास तिवारी जैसे अपराधियों के नामों का उल्लेख भी किया था.
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि यह राज्य के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी की ओर से आया था. इसके बाद उम्मीद की जा रही थी कि जेलों के भीतर नेटवर्क संचालन पर कड़ी निगरानी और प्रभावी कार्रवाई होगी.
आखिर जिम्मेदारी किसकी?
सवाल यह नहीं है कि कौन जेल में बंद है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जेल में बंद अपराधियों के नाम पर कोयला कारोबारियों, होटल व्यवसायियों, जमीन कारोबारियों और ठेकेदारों से रंगदारी मांगने की शिकायतें लगातार सामने आती हैं, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
पुलिस अधिकारियों ने भी कई बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि जेलों में बंद अपराधियों के नेटवर्क पर लगातार निगरानी रखना आवश्यक है. इसके बावजूद समय-समय पर सामने आने वाली शिकायतें यह संकेत देती हैं कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर खामियां बनी हुई हैं.
निगरानी व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
लगातार अलग-अलग जेलों से मोबाइल बरामद होने, विशेष सुविधाएं मिलने और जेल से नेटवर्क संचालित होने जैसे आरोप सामने आने के बाद जेल मुख्यालय की निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है.
जनता यह जानना चाहती है कि हर घटना के बाद होने वाली जांच, निरीक्षण और समीक्षा बैठकों का वास्तविक परिणाम क्या रहा? क्या इन कार्रवाइयों से व्यवस्था में कोई ठोस सुधार हुआ या फिर मामले केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रह गए?
जेल मुख्यालय की भूमिका पर भी चर्चा
जेल आईजी सुदर्शन मंडल की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. लगातार विवादों, मोबाइल बरामदगी, वीआईपी सुविधाओं और संगठित अपराध से जुड़े आरोपों के बीच लोगों की अपेक्षा रहती है कि जेल प्रशासन की ओर से सख्त और प्रभावी कार्रवाई दिखाई दे.
हालांकि अब तक आम लोगों को कार्रवाई से अधिक जांच और समीक्षा की खबरें ही सुनने को मिली हैं. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वर्षों से सामने आ रहे इन आरोपों और शिकायतों के बावजूद जेल व्यवस्था में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं दिखाई दे रहा?



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